अस्सलामु अलैकुम प्यारे दोस्तों! अंधेर नगरी एक ऐसा दिलचस्प क़िस्सा है जो लालच और अक़्लमंदी के दरमियान फ़र्क़ को बहुत ख़ूबसूरती से समझाता है। ये कहानी आपको एक ऐसी अनोखी और अजीब दुनिया में ले जाएगी, जहाँ हर चीज़ का भाव एक ही है, लेकिन वहाँ रहना कितना ख़तरनाक साबित हो सकता है, ये आप इस तहरीर में जानेंगे।
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किस्सा: अंधेर नगरी
किसी गाँव में एक भिखारी रहता था। वह भीख माँगने में तो माहिर था ही, साथ ही बहुत अक़्लमंद भी था। उसका एक शागिर्द था, जो बिल्कुल बेवक़ूफ़ था। भीख माँगने का तरीक़ा उसने अपने उस्ताद ही से सीखा था। दोनों का इस दुनिया में कोई अज़ीज़ रिश्तेदार नहीं था, इसलिए दोनों साथ ही रहते थे। भिखारी अब बहुत बूढ़ा हो चुका था, जबकि उसका शागिर्द बिल्कुल जवान था।
एक दिन ख़ुदा का करना ऐसा हुआ कि उस गाँव को सैलाब ने अपनी लपेट में ले लिया। सारे गाँव के मकान कच्चे थे, इसलिए सब सैलाब में बह गए। उन दोनों का मकान भी न बच सका। देखते ही देखते पूरा गाँव दरहम-बरहम हो
गया। आख़िर उन्होंने भी गाँव छोड़ने का फ़ैसला कर लिया।
एक रोज़ सुबह दोनों अपने गाँव को ख़ैरबाद कहकर बाहर निकल आए। जब उन्होंने गाँव को आख़िरी मर्तबा देखा, तो उनकी आँखों में आँसू भर आए। उस गाँव में उन्होंने ज़िंदगी के न जाने कितने दिन गुज़ारे थे। गाँव से रुख़्सत होकर वो नाक की सीध में चल पड़े। रास्ते भर दोनों आपस में इधर-उधर की बातें भी करते रहे। चलते-चलते सूरज ग़ुरूब होने ही वाला था कि उन्हें एक शहर के आसार दिखाई देने लगे।
“मुबारक हो उस्ताद, आख़िर हम एक शहर तक पहुँच ही गए।”
“ख़ुदा का शुक्र है।” बूढ़े के मुँह से निकला।
दोनों तेज़-तेज़ क़दम उठाने लगे। वो सूरज डूबने से पहले-पहले शहर में पहुँचना चाहते थे, ताकि कुछ खाने-पीने को मिल जाए। दोनों ठीक उसी वक़्त उस शहर में दाख़िल हुए, जब सूरज ग़ुरूब हो रहा था।
“उस्ताद, मुझमें तो अब एक क़दम भी उठाने की हिम्मत नहीं रही। ख़ुदा के लिए कुछ खाने का बंदोबस्त करो।“ शागिर्द ने बेदम होकर गिरने के बाद कहा।
“अच्छा, तुम यहीं ठहरो, मैं किसी घर से कुछ लाता हूँ।“ बूढ़े ने कहा और वहाँ से चला गया।
जल्द ही वो कुछ रोटियाँ और दाल ले आया। दोनों ने सब्र-ओ-शुक्र के साथ उन्हें खाया, कुएँ से पानी पिया और एक दरख़्त के नीचे लेटकर सो गए।
सुबह हुई तो उन्होंने भीख माँगने का बाक़ायदा प्रोग्राम बनाया। दोनों निकल खड़े हुए और सारा दिन भीख माँगते फिरे। शाम हुई तो अपने ठिकाने पर लौट आए।
यह एक घना दरख़्त था, और पिछली रात भी वो इसी के नीचे सोए थे। यहाँ
पहुँचकर बूढ़े ने कहा, “अब हमारे पास कुछ पैसे जमा हो गए हैं। तुम यूँ करो कि बाज़ार से ज़रूरत की चीज़ें ले आओ। हम जंगल में एक झोपड़ी डाल लेंगे और वहीं खाना पकाया करेंगे।“
“अच्छा उस्ताद, मैं अभी लाता हूँ।“ शागिर्द ने ख़ुश होकर कहा और पैसे लेकर चल पड़ा।
शागिर्द बाज़ार पहुँचा तो उसने सोचा, थोड़ी-सी मिठाई भी ख़रीद लूँ। तीन-चार दिन से कोई मीठी चीज़ नहीं खाई। यह सोचकर वह सीधा एक मिठाई की दुकान पर जा पहुँचा।
बाज़ार बहुत बारौनक था और वहाँ ख़ूब चहल-पहल थी। मिठाई की दुकान पर तरह-तरह की मिठाइयाँ सजी हुई थीं। उसने पूछा, “भाई साहब, लड्डू क्या भाव है?”
“टके सेर।“ दुकानदार ने जवाब दिया।
“क्या कहा? टके सेर?” शागिर्द ने हैरानी से पूछा।
“हाँ, टके सेर।“
“और बर्फ़ी क्या भाव है?”
“हर चीज़ टके सेर है।“
“अच्छा, तो मिला–जुलाकर एक सेर दे दो।“ उसने ख़ुश होकर कहा।
मिठाई वाले ने सारी मिठाइयाँ मिलाकर एक सेर तौल दीं। शागिर्द ने उसे एक टका थमाया और फिर सब्ज़ी वाले की दुकान पर जा पहुँचा।
“भाई साहब, गोभी क्या भाव है?” उसने पूछा।
“टके सेर।“ दुकानदार ने कहा।
“और आलू क्या भाव है?” शागिर्द ने हैरानी से पूछा।
“हर चीज़ टके सेर है।“
“क्या?” शागिर्द हैरान रह गया। फिर वह सब कुछ छोड़-छाड़कर दौड़ता हुआ अपने उस्ताद के पास पहुँचा।
उस्ताद ने उसे इस तरह भागते देखा तो पूछा, “क्या बात है? भागते क्यों आ रहे हो? और ये क्या, तुम सिर्फ़ एक लिफ़ाफ़ा उठाए हुए हो? तुम्हें तो कितनी चीज़ें लानी थीं?”
“उस्ताद, मज़े आ गए!” शागिर्द ने ख़ुशी से फूलकर कहा।
“क्या हुआ?” बूढ़े ने पूछा।
“उस्ताद, इस शहर में तो हर चीज़ दो पैसे सेर बिकती है। ये देखो, ये एक सेर मिठाई दो पैसे की लाया हूँ। यहाँ हर चीज़ ही दो पैसे सेर है। मिठाई भी, घी भी, दालें भी, सब्ज़ी भी। ग़रज़ हर चीज़ दो पैसे सेर। यहाँ तो मज़े आ जाएँगे। ख़ूब खाओ–पियो उस्ताद। अब हम सारी उम्र यहीं रहेंगे।“
उस्ताद उसकी बातें सुनकर चुप रह गया। उसके मुँह से कोई लफ़्ज़ न निकला।
“क्या बात है उस्ताद? तुम्हें ख़ुशी नहीं हुई?”
“नहीं बेटा, मुझे ये सुनकर कोई ख़ुशी नहीं हुई।“
“मगर क्यों उस्ताद जी? अब हम अच्छी–अच्छी चीज़ें टके सेर लेकर खाया करेंगे। न कुछ पकाने की ज़रूरत, न मुसीबत उठाने की। बाज़ार से ख़रीदकर खाया करेंगे।“
“तुम बेवक़ूफ़ हो। यहाँ रहना ठीक नहीं।“ उस्ताद ने फ़िक्र मंद होकर कहा।
“ये आप क्या कह रहे हैं उस्ताद? मैं तो यहाँ से हरगिज़ नहीं जाऊँगा। इससे ज़्यादा मज़े और कहाँ आएँगे? भला कोई ऐसी जगह भी हो सकती है, जहाँ हर चीज़ टके सेर बिकती हो?”
“इसीलिए तो कह रहा हूँ कि यहाँ रहना ठीक नहीं है। ये अंधेर नगरी है।“
“आप कुछ भी कहें उस्ताद, मैं इस जगह को छोड़कर नहीं जाऊँगा।“
“और अगर मैं यहाँ न रहूँ तो?” उस्ताद ने पूछा।
“तो भी मैं यहीं रहूँगा। लेकिन मैं कहता हूँ, आप भी न जाएँ तो ज़िंदगी के बाक़ी दिन यहीं ऐश–ओ–आराम से गुज़रेंगे।“
“नहीं, मैं यहाँ नहीं रह सकता।“ उस्ताद भी अपनी ज़िद पर अड़ गया।
“तो फिर मैं अकेला ही चला जाऊँगा।“ उस्ताद ने कहा।
“आपकी मर्ज़ी उस्ताद।“
इस बात पर बूढ़े को बहुत सदमा पहुँचा। उसने शागिर्द को अपनी औलाद की तरह पाला था और उससे बहुत मोहब्बत करता था। वह सोच भी नहीं सकता था कि एक दिन उसका शागिर्द उससे ऐसी बेरुख़ी से पेश आएगा।
ख़ैर, दोनों ने मिठाई खाई और फिर पड़कर सो गए। सुबह हुई तो उस्ताद उठ खड़ा हुआ।
“कहाँ चले उस्ताद?” शागिर्द ने पूछा।
“मैंने कहा था न कि मैं यहाँ नहीं ठहर सकता।“
“तो क्या अभी और इसी वक़्त जा रहे हो?”
“हाँ, मुझे यहाँ रहने से ख़ौफ़ आता है।“
“मान जाओ उस्ताद, यहाँ से न जाओ। दुनिया के तख़्ते पर इतना ऐश कहीं नहीं कर सकोगे, जितना यहाँ। और अगर तुम जाए बग़ैर रह नहीं सकते, तो दो–चार दिन तो ऐश करते जाओ।“
“नहीं, मैं सिर्फ़ दिन निकलने तक ठहरा था। अब एक मिनट भी नहीं रुकूँगा।“
उस्ताद ने अपना झोला कंधे पर डाला और शहर से बाहर जाने वाली सड़क पर निकल गया।
“ठहरो उस्ताद, मैं तुम्हें शहर के बाहर तक छोड़ आता हूँ।“
यह कहकर शागिर्द भी उसके पीछे लपका। फिर दोनों साथ-साथ क़दम उठाने लगे।
शागिर्द कहने लगा, “मैं हैरान हूँ उस्ताद, आख़िर आपको यहाँ रहने में क्या डर है? क्या ख़तरा है? हमारा काम तो भीख माँगना है। हमें किसी से क्या डरना? हमें कौन नुक़सान पहुँचा सकता है?”
“इस वक़्त तुम मेरी इन बातों को नहीं समझ सकते। लेकिन एक दिन आएगा, जब तुम मेरी ये बातें याद करोगे और कहोगे, काश मैंने अपने उस्ताद की बातें मान ली होतीं। मैं अब भी तुमसे कहता हूँ कि मेरे साथ चले चलो। लालच में मत आओ।“
“हरगिज़ नहीं उस्ताद, मैं इसी जगह रहूँगा।“
“अच्छा, तो मेरी एक बात सुन लो। अगर कभी तुम किसी मुसीबत में गिरफ़्तार हो जाओ, तो अपने उस्ताद को ज़रूर दिल ही दिल में याद कर लेना। हो सकता है कि क़ुदरत मुझे तुम्हारी मदद के लिए भेज दे।“
“आप यूँ ही फ़िक्र कर रहे हैं उस्ताद। मुझे यहाँ कोई तकलीफ़ नहीं होगी। मुझ पर कोई मुसीबत नहीं टूटेगी।“
“मैं तुमसे आख़िरी बार कहता हूँ, मेरे साथ चलो।“ उस्ताद ने मायूस होकर कहा।
“और अब मैं भी आख़िरी बार कहता हूँ, मैं यहीं रहूँगा।“ शागिर्द ने अटल लहजे में जवाब दिया।
उसने अपने रहने के लिए घास-फूस की एक झोपड़ी बना ली और उसमें मज़े से रहने लगा। अब वह हर फ़िक्र से आज़ाद था। सुबह उठकर भीख माँगने के लिए निकल खड़ा होता, और जो दो-चार आने हाथ लगते, वो उसकी ज़रूरत से
कहीं ज़्यादा होते, क्योंकि हर चीज़ टके सेर मिल जाती थी।
वह मिठाइयाँ, घी, दूध और ख़ुश्क मेवे पेट भर-भरकर खाता, और अपने उस्ताद को बेवक़ूफ़ ख़याल करके ख़ूब हँसता। अक्सर कहता, “काश उस्ताद यहाँ से न जाता।“
अब उससे कोई काम भी न होता था। कई-कई दिन तो भीख माँगने भी न जाता। उसकी झोपड़ी में खाने-पीने की चीज़ों का ढेर लगा रहता। वह उनमें से ले-लेकर ख़ूब खाता और कहकहे लगाता।
हर फ़िक्र से आज़ाद रहने, ख़ूब खाने और कोई मेहनत-मशक़्क़त का काम न करने की वजह से उसका जिस्म मोटा होने लगा। वह अपने मोटे होते जिस्म को देखकर बहुत ख़ुश होता और पहले से भी ज़्यादा खाने लगता।
रफ़्ता-रफ़्ता उसका जिस्म फूलता चला गया, यहाँ तक कि वह इतना कुप्पा हो गया कि अब उससे ठीक तरह चलना भी मुश्किल हो गया।
जब पैसे ख़त्म होने लगते, तो वह बाज़ार में जाकर किसी मोड़ पर बैठ जाता। शहर के लोग उसके मोटापे पर हँसते हुए उसे कुछ-न-कुछ दे देते। उन्हीं पैसों से वह फिर सेरों के हिसाब से चीज़ें ख़रीदकर अपनी झोपड़ी में जमा कर लेता और खाने लगता।
अब यही उसकी ज़िंदगी बन चुकी थी, और उसका मोटापा रोज़-ब-रोज़ बढ़ता ही जा रहा था।
अब उस मुल्क के बादशाह का हाल सुनिए। एक दिन वह अपने तख़्त पर बैठा था। दरबार लगा हुआ था और तमाम दरबारी हाज़िर थे कि उसके सामने एक शख़्स को पकड़कर लाया गया।
बादशाह ने पूछा, “ये शख़्स कौन है?”
“बादशाह सलामत, इस शख़्स को बाज़ार से पकड़ा गया है।“
“ये बाज़ार में क्या कर रहा था?”
“जहाँपनाह, इसने एक शख़्स की जेब काटी है।“
“वो कहाँ है जिसकी जेब काटी गई है?” बादशाह ने पूछा।
“वो बाहर मौजूद है।“ सिपाही बोला।
“उसे पेश करो।“ बादशाह ने हुक्म दिया।
वह शख़्स दरबार में पेश किया गया। बादशाह ने उससे पूछा, “क्या इस शख़्स ने तुम्हारी जेब काटी है?”
“जी हाँ हुज़ूर।“ उसने कहा।
“तुमने इसे जेब काटने ही क्यों दी?” बादशाह ने ग़ुस्से से गुर्राकर पूछा।
“जी…” वह शख़्स घबरा गया और उसके मुँह से आगे कोई लफ़्ज़ न निकल सका।
“तुम्हारी ग़फ़लत की सज़ा तुम्हें दी जाएगी। जेबकतरे को छोड़ दो, क्योंकि ये तो लोगों को होशियार करने का फ़र्ज़ अंजाम दे रहा है, और इसे पकड़ लो। इसने जेब कटने क्यों दी? कल सुबह इसे शहर के चौराहे पर फाँसी पर लटकाया जाएगा।“
बादशाह का हुक्म सुनते ही जेबकतरे को छोड़ दिया गया और जिसकी जेब कटी थी, उसे पकड़ लिया गया।
दूसरे दिन चौराहे पर तिल धरने की जगह बाक़ी न थी। उस बेगुनाह शख़्स को ज़ंजीरों में जकड़कर चौराहे तक लाया गया। वह ग़रीब थर-थर काँप रहा था। लोगों की तादाद में लम्हा-ब-लम्हा इज़ाफ़ा होता जा रहा था।
आख़िर ख़ुदा-ख़ुदा करके बादशाह सलामत की सवारी आ पहुँची। बादशाह एक ऊँची जगह पर खड़ा हो गया और उसने इशारा किया कि फाँसी दे दी जाए।
जल्लाद आगे बढ़ा। उसने फंदा उस आदमी की गर्दन में डाला, लेकिन फंदा ढीला था और वह शख़्स बहुत दुबला-पतला था। जल्लाद में भी इतनी अक़्ल कहाँ थी कि फंदे की गिरह को तंग कर देता। वह हैरान और परेशान कभी फंदे को देखता, तो कभी उस आदमी की गर्दन को।
“क्या बात है? तुम इसे फाँसी क्यों नहीं देते?” बादशाह ने ग़ुस्से के आलम में पूछा।
“आलमपनाह, फाँसी का फंदा इस शख़्स की गर्दन में फ़िट नहीं होता। फंदा बहुत ढीला है और ये शख़्स बहुत दुबला–पतला है। अब मैं इसे फाँसी दूँ तो कैसे दूँ?”
बादशाह ने ये सुना तो सोच में डूब गया। उसके वज़ीर और अमीर भी परेशान हो गए। सब मिलकर सोचने लगे कि फाँसी कैसे दी जाए, लेकिन किसी की समझ में ये बात न आई कि फंदे की गिरह को तंग करके भी फाँसी दी जा सकती है।
जब किसी की समझ में कुछ न आया, तो बादशाह ख़ुश होकर बोला, “तुम सब बिल्कुल बेवक़ूफ़ हो। गधे हो, जो इतनी–सी बात भी नहीं सोच सकते। अगर
इस शख़्स की गर्दन में फाँसी का फंदा नहीं आता, तो इसे छोड़ दो और शहर में जिसकी गर्दन में ये फंदा फ़िट आ जाए, उसे फाँसी दे दो। लेकिन फाँसी देने से पहले हमें ज़रूर इत्तिला दी जाए, क्योंकि हम ये तमाशा अपनी आँखों से देखना चाहते हैं।“
बादशाह का हुक्म सुनकर सब लोग उसकी अक़्लमंदी की दाद दिए बग़ैर न रह सके। उन्हें लगा कि उसने कितनी शानदार तरक़ीब बताई है, और वो सब कितने बेवक़ूफ़ हैं कि इतनी-सी बात भी न सोच सके।
फंदा उतारकर सिपाहियों को दे दिया गया और वो ऐसे शख़्स की तलाश में निकल खड़े हुए, जिसकी गर्दन में फंदा फ़िट आ सके।
सबसे पहले वो एक मोटे हलवाई के पास पहुँचे। उन्होंने सोचा, ये शख़्स काफ़ी मोटा है, इसलिए उम्मीद है कि इसकी गर्दन में फंदा फ़िट आ जाएगा।
उन्होंने उससे कहा, “नीचे उतरो।“
हलवाई सरकारी आदमियों को देखकर बहुत घबरा गया। मगर मरता क्या न करता, नीचे उतर आया।
सिपाहियों ने फंदा उसकी गर्दन में डालकर देखा, लेकिन वो बहुत ढीला था। उन्होंने मायूस होकर फंदा उसकी गर्दन से निकाल लिया और कहा, “जाओ, तुम फाँसी के लायक़ नहीं। तुम्हारी गर्दन इतनी मोटी नहीं है, जितना कि ये फंदा।“
इसी तरह वो लोगों के गले में फंदा डाल-डालकर देखते रहे, लेकिन फंदा चूँकि बहुत ढीला था, इसलिए किसी की गर्दन में फ़िट ही नहीं आता था।
अचानक सिपाहियों को एक बहुत ही मोटा आदमी नज़र आया। उसे देखकर वो ख़ुश हो गए और उसकी तरफ़ बढ़ने लगे।
वो शख़्स एक मिठाई की दुकान पर खड़ा था। शागिर्द तीन-चार दिन से बाज़ार नहीं गया था। झोपड़ी में पड़ी खाने की चीज़ें ख़त्म हो गई थीं और उसके पास पैसे भी नहीं बचे थे। इसलिए वो बाज़ार की तरफ़ चल पड़ा और रास्ते में भीख भी माँगता गया।
बाज़ार पहुँचते-पहुँचते उसे तीन-चार आने भीख में मिल चुके थे। इसलिए वो सबसे पहले एक मिठाई की दुकान पर गया और उससे पाँच सेर मिठाई तौलने के लिए कहा।
हलवाई अभी मिठाई तौल ही रहा था कि अचानक उसके हाथ से तराज़ू छूटकर
नीचे गिर पड़ा।
“क्या बात है? क्या तुम्हारे हाथों में जान नहीं है?”
“वो… वो आ रहे हैं।” मिठाई वाले ने ख़ौफ़ज़दा होकर कहा।
“कौन आ रहे हैं? तुम इस क़दर डरे हुए क्यों हो?” शागिर्द ने हैरानी से पूछा।
इतने में सिपाही फंदा लिए वहाँ पहुँच गए। उन्होंने दूर से शागिर्द को ही देखा था, जिसे देखकर वो बहुत ख़ुश हुए थे।
“पहलवान! ज़रा अपनी गर्दन तो इधर लाना।” एक सिपाही ने मुस्कुराकर कहा।
“क्यों? क्या बात है?” शागिर्द ने हैरान होकर पूछा।
“एक शख़्स को फाँसी दी जाने वाली थी, लेकिन ये फंदा उसके गले में नहीं आया। इसलिए हमारे बादशाह सलामत ने हुक्म दिया है कि जिस शख़्स की गर्दन में ये फंदा फ़िट आ जाए, उसे फाँसी पर चढ़ा दो। हम सुबह से किसी ऐसे आदमी की तलाश में हैं, लेकिन अभी तक कोई ऐसा आदमी नहीं मिला, जिसकी गर्दन में ये फंदा फ़िट आ सके। अब तुम नज़र आए हो। उम्मीद है कि तुम्हारी गर्दन में ये फंदा ज़रूर फ़िट आ जाएगा।”
“अरे, मगर ये क्या इंसाफ़ है?” शागिर्द ने चिल्लाकर कहा।
“ये हमारे बादशाह सलामत का इंसाफ़ है। इसके ख़िलाफ़ कोई आवाज़ नहीं उठा सकता। यहाँ हर चीज़ टके सेर उन्हीं के हुक्म से बिकती है।“ सिपाही ने कहा और अपने साथियों को इशारा कर दिया।
फ़ौरन शागिर्द को जकड़ लिया गया। जब फाँसी का फंदा उसके गले में डाला गया, तो वो बिल्कुल फ़िट आ गया। ये देखकर सिपाही बहुत ख़ुश हुए और उसे क़ैदख़ाने की तरफ़ ले चले।
अब शागिर्द को मालूम हुआ कि उसका उस्ताद यहाँ रहने से क्यों डरता था। लेकिन अब पछताने से क्या हासिल हो सकता था?
उसे क़ैदख़ाने में डालकर बादशाह को ये ख़ुशख़बरी सुना दी गई कि ऐसा शख़्स मिल गया है, जिसके गले में फाँसी का फंदा फ़िट आ गया है। ये ख़बर सुनकर बादशाह बहुत ख़ुश हुआ। उसने उसी वक़्त हुक्म दिया कि उसे कल शहर के चौराहे पर फाँसी पर लटका दिया जाए।
अब शागिर्द को अपने उस्ताद की बातें बुरी तरह याद आने लगीं।
अब उस्ताद का हाल सुनिए। वो उस शहर से निकला तो बहुत उदास था, क्योंकि उसका शागिर्द उस शहर में उससे बिछड़ गया था। वो शहर-शहर और
गाँव-गाँव घूमता रहा, भीख माँगता रहा, और जो रूखी-सूखी मिल जाती, उसे खाकर सो जाता। ख़ुदा को याद करता और दिन निकलते ही फिर भीख माँगने निकल पड़ता।
उसकी ज़िंदगी के दिन यूँ ही गुज़र रहे थे कि एक दिन अचानक उसे अपने शागिर्द का ख़याल आया। उसने सोचा, चलकर देखना चाहिए कि वो किस हाल में है, ख़ैरियत से तो है।
ये सोचकर उसने उसी शहर का रुख़ किया। सारा दिन और सारी रात चलते रहने के बाद वह शहर में दाख़िल हुआ और उस जगह पहुँचा, जहाँ दोनों ने क़याम किया था। वहाँ उसने एक झोपड़ी देखी, लेकिन उसके अंदर शागिर्द मौजूद नहीं था।
वह उसे ढूँढ़ता हुआ शहर के चौक की तरफ़ चल पड़ा। रास्ते में उसने देखा कि हर कोई शहर के चौक की तरफ़ बढ़ा चला जा रहा है।
उसने एक आदमी से इसकी वजह पूछी, तो उसने बताया कि आज एक आदमी को चौराहे पर फाँसी दी जाएगी।
वो भी चौराहे की तरफ़ बढ़ने लगा। एक तरफ़ से उसे सात-आठ सिपाही एक बहुत मोटे आदमी को ज़ंजीरों में जकड़े हुए लाते दिखाई दिए।
उस्ताद ने उस मोटे आदमी को देखा, मगर पहचान न सका। जब वो क़रीब आए, तो शागिर्द की नज़र अपने उस्ताद पर पड़ी। वह ज़ोर से चिल्लाया, “उस्ताद!”
उस्ताद के कान खड़े हो गए। अब जब उसने उस मोटे आदमी को ग़ौर से देखा, तो उसे पहचान लिया और हैरानी से बोला, “ये तुम हो?”
“हाँ उस्ताद।“
“तुम इस हाल तक कैसे पहुँचे?”
शागिर्द ने सारा माजरा कह सुनाया। उस्ताद ये सुनकर गहरी सोच में पड़ गया। फिर वह शागिर्द के क़रीब आया और उसके कान में मुँह ले जाकर धीरे से बोला, “अब तुम्हें बचाने की सिर्फ़ एक ही तदबीर है।“
“वो क्या उस्ताद?” शागिर्द ने ख़ुश होकर पूछा।
“जब तुम्हें फाँसी दी जाने लगेगी, तो मैं कहूँगा कि फाँसी मुझे दो। और तुम कहना, फाँसी मुझे दो।“
“मैं कुछ समझा नहीं उस्ताद।“ शागिर्द ने हैरानी से कहा।
“मैंने तुमसे जो कहा है, बस वही करना। आगे तुम्हें बचाना मेरा काम है।“
“बहुत अच्छा उस्ताद।“ शागिर्द ये सुनकर ख़ुश हो गया।
चलते-चलते दोनों चौराहे तक पहुँच गए। शागिर्द को फाँसी के तख़्ते पर खड़ा कर दिया गया। फाँसी का फंदा उसकी आँखों के सामने झूल रहा था। उसे देखकर वह सहम गया कि कहीं उसका उस्ताद उसे बचाने में नाकाम न हो जाए।
आख़िर बादशाह की सवारी आ पहुँची। लोगों ने उसे देखकर ख़ुशी से नारे लगाए। बादशाह अपनी मख़्सूस जगह पर खड़ा हो गया। उसने एक नज़र सारे मजमे पर डाली और बुलंद आवाज़ में कहने लगा, “ऐ मेरी रइया, आख़िर हम ऐसे आदमी को पाने में कामयाब हो ही गए, जिसके गले में फाँसी का फंदा फ़िट आ गया। अब मैं हुक्म देता हूँ कि इसे फाँसी दे दी जाए।“
जल्लाद ने ये सुनकर फाँसी का फंदा हाथ में पकड़ा और उसे शागिर्द की गर्दन में फँसाने लगा। ऐन उसी वक़्त उस्ताद ज़ोर से चिल्लाया, “ठहरो! इसको फाँसी न दो, बल्कि फाँसी मुझे दो।“
सारे मजमे पर सन्नाटा तारी हो गया। जल्लाद के हाथ रुक गए। बादशाह भी चौंक उठा। सब लोग मुड़-मुड़कर उस्ताद की तरफ़ देखने लगे, जो मजमे से निकलकर फाँसी के तख़्ते की तरफ़ आ रहा था।
“कौन हो तुम? और तुम्हें सरकारी कामों में दख़ल देने की जुर्रत कैसे हुई?” बादशाह ने पूछा।
“इसकी जगह फाँसी मुझे दो।“ उस्ताद ने कहा।
“नहीं बादशाह सलामत, ये जुल्म न कीजिए। फाँसी मुझे ही दें।“ शागिर्द जल्दी से बोला।
“हरगिज़ नहीं, फाँसी मुझे दें।“ उस्ताद फिर बोला।
उनकी तकरार जारी थी और सब लोग हैरान थे। आज तक उन्होंने अपनी ज़िंदगी में कोई ऐसा आदमी नहीं देखा था, जो ख़ुद अपने आपको फाँसी दिलाने के लिए ज़िद करे, और यहाँ तो ऐसे दो आदमी मौजूद थे।
बादशाह की हैरत का भी कोई ठिकाना न था। आख़िर उसने चिल्लाकर कहा, “आख़िर बात क्या है? तुम फाँसी पाना क्यों चाहते हो?”
“बस यूँ ही, आप इसको छोड़ दें और मुझे फाँसी दे दें।“ उस्ताद ने कहा।
बादशाह ने हैरानी से पूछा, “तुम दोनों फाँसी पाने के लिए इतने बेचैन क्यों हो?”
“दरअस्ल बात ये है…” उस्ताद ने कहना शुरू किया।
“बात मैं बताऊँगा उस्ताद।“ शागिर्द ने अचानक कहा।
“तुम ख़ामोश रहो।“ उस्ताद ने उसे डाँटा।
“हाँ, तो ऐ बुज़ुर्ग! बताओ तुम।“ बादशाह की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। दूसरे लोग भी साँस रोके खड़े थे।
“बात दरअस्ल ये है, बादशाह सलामत, कि आज का दिन बहुत मुबारक है। आज के दिन जो भी फाँसी पाएगा, सीधा जन्नत में जाएगा। इसलिए मरना तो एक दिन है ही, तो इस मोटे के बजाय आप मुझे फाँसी दे दें।“
ये सुनना था कि चारों तरफ़ शोर मच गया। वज़ीर ने आगे बढ़कर कहा, “मैं यहाँ का वज़ीर हूँ, इसलिए आप मुझे फाँसी दें, ताकि मैं सीधा जन्नत में चला जाऊँ।“
बादशाह ने हैरानी से उसे देखा। ऐन उसी वक़्त कई दूसरे लोग भी चिल्ला उठे, “फाँसी मुझे दी जाए! फाँसी मुझे दी जाए!”
अब बादशाह परेशान हो गया कि फाँसी किसे दे और किसे न दे।
शागिर्द हैरानी से कभी अपने उस्ताद को देखता, तो कभी मजमे को, और दिल ही दिल में ख़ुश हो रहा था।
बादशाह ने हाथ के इशारे से मजमे को ख़ामोश किया और बोला, “सबसे ज़्यादा हक़दार तो मैं हूँ। मैं तुम्हारा बादशाह हूँ, इसलिए आज फाँसी चढ़कर जन्नत में मैं जाऊँगा।“
ये सुनकर सब लोग हैरान रह गए। बादशाह के आगे कौन क्या कर सकता था?
सब लोग बादशाह को फाँसी के तख़्ते की तरफ़ जाते हुए देखते रहे। यहाँ तक कि वह तख़्ते पर चढ़ गया। उसने मोटे शागिर्द को नीचे उतरने का इशारा किया।
शागिर्द ख़ुदा का शुक्र अदा करता हुआ नीचे उतर आया। बादशाह ने जल्लाद को हुक्म दिया कि फाँसी का फंदा उसके गले में डालकर उसे फाँसी दे दी जाए।
जल्लाद ने हुक्म की तामील की और बादशाह को फाँसी दे दी।
बादशाह को फाँसी दिए जाने का ये मंज़र लोग हैरत से देख रहे थे। सब यही समझ रहे थे कि उनका बादशाह सीधा जन्नत में जा रहा है। इसी मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए उस्ताद और शागिर्द दोनों चुपचाप वहाँ से निकल आए।
वो फ़ौरन उस सल्तनत से दूर निकल गए, ख़ुदा का शुक्र अदा किया और अपनी अक़्लमंदी पर ख़ुश होने लगे।
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सबक़
- लालच का अंजाम बुरा होता है: शागिर्द ने सस्ते खाने के लालच में अपनी जान ख़तरे में डाल दी थी।
- उस्ताद की नसीहत की क़दर: बड़ों और उस्तादों की बातों में हमेशा कोई न कोई हिकमत छुपी होती है।
- अक़्ल बड़ी या भैंस: जहाँ ताक़त और क़ानून काम नहीं आता, वहाँ ज़ेहनी चालाकी और अक़्लमंदी इंसान की जान बचा लेती है।
- बेवक़ूफ़ हुक्मरान: जिस जगह के फ़ैसले अक़्ल के बजाय बेवक़ूफ़ी पर हों, वहाँ का निज़ाम जल्द तबाह हो जाता है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. सवाल: ‘अंधेर नगरी’ कहानी से क्या सबक़ मिलता है?
जवाब: लालच का अंजाम हमेशा बुरा होता है। जहाँ ताक़त काम नहीं आती, वहाँ अक़्लमंदी और सूझ-बूझ से बड़ी से बड़ी मुसीबत को टाला जा सकता है।
2. सवाल: उस्ताद ने ‘अंधेर नगरी’ को क्यों छोड़ दिया था?
जवाब: उस्ताद समझ गए थे कि जिस शहर में हर चीज़ एक ही भाव (टके सेर) बिकती हो, वहाँ का निज़ाम अक़्ल और इंसाफ़ पर नहीं टिका है। ऐसी बेवक़ूफ़ाना जगह पर रहना ख़तरनाक हो सकता है।
3. सवाल: शागिर्द मुसीबत में कैसे फँस गया?
जवाब: बादशाह के अजीब हुक्म की वजह से। शागिर्द मुफ़्त का खा-पीकर मोटा हो गया था, इसलिए फंदा उसकी गर्दन में फिट आ गया।
4. सवाल: उस्ताद ने शागिर्द की जान कैसे बचाई?
जवाब: उस्ताद ने बादशाह की बेवक़ूफ़ी का फ़ायदा उठाया। उन्होंने झूठ कह दिया कि आज जो भी फाँसी चढ़ेगा वह सीधा जन्नत जाएगा। जन्नत के लालच में आकर बेवक़ूफ़ बादशाह ने ख़ुद को ही फाँसी पर लटका लिया।
आख़िरी बात
प्यारे दोस्तों, ये कहानी हमें याद दिलाती है कि कभी भी ज़ाहिरी चमक-दमक और लालच में आकर अपनों की नसीहत को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
आपको उस्ताद की ये तरक़ीब कैसी लगी? क्या शागिर्द को पहले ही उस्ताद की बात मान लेनी चाहिए थी? हमें कमेंट करके अपनी राय ज़रूर दें। अगर आपको ये क़िस्सा: अंधेर नगरी पसंद आया हो, तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और ऐसी ही मज़ीद कहानियों के लिए हमें फ़ॉलो करें। शुक्रिया!
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