क़िस्सा अनोखी शर्त: एक मज़ाहिया और सबक आमोज़ कहानी

किस्सा: अनोखी शर्त

कई लोगों को शर्तें लगाने की आदत होती है, और वह हर बात पर सिर्फ इसलिए शर्त लगाते हैं कि दूसरे उनकी हर बात को मान लिया करें। खलील साहब भी अपनी झूठी बातों को मनवाने के लिए अक्सर शर्त लगाया करते। चूंकि खलील साहब दौलतमंद आदमी थे, इसलिए शर्त लगाकर शिकस्त खाने के बाद इनाम की रकम अदा करना मुश्किल ना था। लेकिन दूसरे लोग अपना पैसा बचाने के लिए अक्सर खलील साहब की झूठी बातें मान लिया करते थे।

एक बार खलील साहब ने खामखां फिर शर्त लगा दी। हालांकि उसूलन यह शर्त गलत थी। इस्लाम की शादी का मसला था। बस यहां भी खलील साहब ने शर्त लगाते हुए गप हांकी कि वह एक माह के अंदर अंदर इस्लाम की शादी करवा सकते हैं। लेकिन आमिर साहब को इस बात की हकीकत का इल्म था कि इस्लाम की शादी का मसला काफी दुश्वार है, क्योंकि वह हर जगह अपनी बुरी आदतों की वजह से बदनाम था।

इस्लाम आवारा था। उसके वालिदैन कई जगह कोशिश कर चुके थे कि इस्लाम की शादी हो जाए, मगर लोग उसके साथ अपनी लड़की की शादी करने पर तैयार ना थे। इसलिए आमिर साहब ने भी ज़िद करके शर्त लगा दी कि इस्लाम की शादी होना ही नामुमकिन है। इस नामुमकिन बात को मुमकिन बनाना, और वह भी एक माह के अंदर, मुश्किल था।

इस्लाम चूंकि बद-कमाश लड़का था, इसलिए तकरीबन हर तरफ उसकी बुराइयों का चर्चा था। फिर भी एक गैर खानदान में उसके रिश्ते की बात चल निकली, तो खलील साहब ने अपनी आदत के मुताबिक एक बार फिर खामखां शर्त लगा ली कि वह इस्लाम की शादी करवा देंगे। लेकिन आमिर साहब का अंदाजा था कि यकीनन यह लोग भी लड़के की बदनामी सुनकर या देखकर रिश्ता देने से इंकार कर देंगे।

आमिर साहब दरअसल इस्लाम को इस बात का एहसास दिलवाना चाहते थे कि बुरे नौजवानों को इसी तरह मुआशिरे वाले ठुकराते हैं। अगर तुम अच्छे काम करते, और मेहनत से अपनी जिंदगी को संवारने की कोशिश करते, तो तुम्हारी शादी आसानी के साथ हो सकती थी। लेकिन खलील साहब अपनी गपबाजी की आदत से मजबूर थे। उन्होंने लड़के के परेशान मां-बाप को तसल्ली दी, और उनको यकीन दिलाया कि वह किसी ना किसी तरह इस्लाम की शादी करवा देंगे।

आमिर साहब और खलील साहब के दरमियान में कुछ तल्ख़ कलामी भी हुई, मगर हर बात मजाक में उड़ा देने वाली आदत ने इस अनोखी शर्त को वजूद दिला दिया, जो उनके दरमियान तय पा गई।

खलील साहब ने शर्त जीतने की खातिर इस बार कुछ जहन को भी इस्तेमाल किया, और लड़की वालों के हालात मालूम करके उनके नफ्सियात के मुताबिक ऐसा मंसूबा बनाया कि उनको सौ फीसदी अपनी कामयाबी पर भरोसा था। मगर आमिर साहब को यह सोचकर अपनी शर्त जीतने का यकीन था कि लड़की वाले किसी तरह भी खलील साहब की लच्छेदार बातों में नहीं आएंगे, क्योंकि उनको यह भी यकीन था कि अपनी आदत के मुताबिक बे-सिरो-पैर की बातें करने पर खलील की बातों में जोर ही नहीं आएगा।

बहरहाल, दूसरी तरफ खलील साहब ने लड़की वालों के घर जाने से क़ब्ल एक मीरासी को भी ले लिया, जो बातें बनाने में अपनी मिसाल आप था। खलील साहब ने मीरासी को समझाया कि जब लड़की वाले लड़के वालों से पूछ गुच्छ के जरिए ऐसी बात मालूम करें, जो उनके इज्जत और वकार में इजाफा करने वाली हो, तो वह खूब मिर्च मसाले लगाकर बढ़ा चढ़ाकर बात सुना दिया करे, ताकि लड़की वाले उनके घर रिश्ता कर दें।

मीरासी ने अच्छी तरह ज़हन नशीन कर लिया। वह समझ गया कि उसने लड़के और उसके खानदान वालों की तारीफ में चार चांद लगाने हैं। चूंकि लड़की वाले मॉडर्न लोग थे, लिहाजा उन्होंने लड़के और उसके वालिदैन को अपने घर दावत पर बुलवाया, तो उनके साथ खलील साहब खुद भी चले गए, और अपने साथ मीरासी को भी ले गए।

लड़के वालों ने उनकी खूब आवभगत की, और अपने रहन सहन का अच्छी तरह मुज़ाहिरा किया। खाने पीने के बाद संजीदगी के साथ लड़की वालों ने उनसे बातें शुरू कीं, और पूछा, “लड़के का क्या कारोबार है?” इस्लाम के वालिद के बोलने से पहले ही वह मीरासी साहब बोल पड़े, “अजी साहब, लड़के के कारोबार कई हैं, क्या गिनती करवाएं?”

दूसरा सवाल बैंक बैलेंस के मुताल्लिक किया गया, तो वही साहब फिर बोल पड़े, “अरे साहब, एक बैंक हो, तो नाम भी बताया जाए। कई बैंकों में तो लड़के का रुपया जमा है।”
तीसरा सवाल लड़के की उम्र के मुताल्लिक था। लिहाजा जवाब में उसी साहब ने कहा, “यही कोई पचास साल होगी।” “जी, क्या कहा,” लड़की का बाप चौंक पड़ा, “पचास साल?” मीरासी ने अपनी झोंक ही में जब उम्र में भी इजाफा किया, तो इस्लाम के बाप ने ज़ोर के साथ खांसकर उसे गलत बात कहने से मना करने का इशारा किया।

वह अपनी खांसी ना रोक सके। मीरासी का नाम अकबर था। वह संभल गया। उसने खांसी का इशारा समझकर बात पलट कर कहा, “मेरा मतलब पच्चीस साल उम्र होगी।” इस्लाम के वालिद मुतमइन हो गए, लेकिन उनको खांसी लग गई। वह बात बात पर खांसना शुरू हो गए।

तो लड़की के बाप ने हैरानी से पूछा, “अरे भाई, यह खांसी कब से आपको हुई है? यह खांसी तो खतरनाक है।” यहां भी अकबर ने तारीफी पहलू को मद्देनजर रखते हुए कहा, “अजी साहब, खांसी का आप क्या पूछते हैं, यह तो बचपन से इनको है। बल्कि हकीकत तो यह है कि खांसी इनकी खानदानी बीमारी है, पुश्त दर पुश्त से चली आ रही है।”

ऐं, साहिबे खाना चौंक कर बोले, “क्या कोई इस मर्ज से मरा भी था?” जी हां, अकबर झट से बोल पड़ा, “एक आदमी क्या जनाब, इनके खानदान का हर फर्द खांसी से मरा है।”
क्या?
, साहिबे खाना उछल पड़े, “उफ्फ, तौबा, ना भाई साहब, मैं अपनी लड़की की शादी ऐसे घराने में नहीं करूंगा, जिसमें इस खतरनाक बीमारी के इतने गहरे जरासीम फैले हैं।”

“अरे नहीं भाई,” इस्लाम के वालिद ने जल्दी से जवाब दिया, “ऐसी कोई बात नहीं है, अकबर को खामखां बकवास करने की आदत है, आप इसकी बातों पर ध्यान ना दें।”
“क्यों ना ध्यान दें?”
 अकबर ने मुदाखिलत करते हुए कहा, “आपने खुद ही तो मुझे कहा था कि मैं हर बात बढ़ा चढ़ाकर बयान करूं, अब मुझे बकवास कह रहे हो।”
“खूब,”
 साहिबे खाना मुस्कुराए, “गोया आप मुझे बेवकूफ बनाने आए थे, अब तो मैं हरगिज रिश्ता देने को तैयार नहीं हूं।”

“मेरी बात तो सुनिए,” खलील साहब घबराकर बोले।
“मैं कोई सुनने को तैयार नहीं,” साहिबे खाना बोले, “बस आप लोग चले जाएं, मैं ऐसे नुमाइशी लोगों से रिश्तेदारी करने को बिल्कुल ही मुनासिब नहीं समझता।”

इस्लाम के बाप और खलील साहब दोनों ने लाख कोशिश की, लड़की का वालिद उनकी बात सुन ले, मगर वो कामयाब ना हुए, और गुस्से में उबलते हुए वापस आ गए।
बाहर आकर दोनों ने खूब अकबर पर अपना गुस्सा उतारा, लेकिन इस्लाम को खलील साहब पर ताव आ गया, उसने खरी खरी सुनाई।
खलील साहब बेहद शर्मिंदा हुए, और वो आमिर साहब से लगाई हुई शर्त हार गए। इस अनोखी शर्त में खलील साहब को पांच सौ रुपये हारना पड़ा। जो दुर्गति उनकी बीवी और भाई ने बनाई, वह उससे अलग थी।

आखिर में आमिर साहब ने इस्लाम को समझाया, और कहा कि वह मेहनत करे, बुरी सोहबत छोड़ दे, और अच्छा आदमी बनने की कोशिश करे, तो उसके बिगड़े हुए तमाम काम ठीक हो जाएंगे।

इस ज़िल्लत पर इस्लाम को वाकई बेहद निदामत हुई। तो उसने बुरी सोहबत छोड़कर अच्छा लड़का बनने का इरादा कर लिया, और चंद दिनों बाद ही वह कारोबार में लग गया, और मेहनत शुरू कर दी।

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सबक़

झूठ और दिखावा कभी काम नहीं आते, और इंसान की असली इज्जत उसके अच्छे किरदार और मेहनत में होती है।

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