तआरुफ़
बादशाही अंगूठी एक बहुत ही दिलचस्प और सबक़आमोज़ क़िस्सा आपकी ख़िदमत में पेश करने जा रहा हूँ। अस्सलाम वालेकुम दोस्तों, उम्मीद है आप सब ख़ैरियत से होंगे। ये कहानी एक ऐसे बादशाह की है जो नया-नया तख़्तनशीन हुआ था और अपनी बादशाहत की दौलत इस क़दर लुटाने लगा कि देखते ही देखते ख़ज़ाना ख़ाली हो गया। मगर उसे क्या ख़बर थी कि उसके वालिद उसके लिए एक ऐसा पुरअसरार राज़ छोड़ गए हैं, जो आगे चलकर उसकी पूरी ज़िंदगी का रुख़ बदल देगा। आख़िर वो राज़ क्या था और कैसे उसके हाथ एक ऐसी अंगूठी लगी, जिसने उसकी तक़दीर ही बदल डाली? आइए दोस्तों, बिना देर किए शुरू करते हैं बादशाही अंगूठी का ये दिलचस्प, पुरअसरार और सबक़आमोज़ क़िस्सा।
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बादशाही अंगूठी – जिन्नों की जादुई अंगूठी का हैरतअंगेज़ क़िस्सा
एक था बादशाह, हमारा तुम्हारा ख़ुदा बादशाह। जब उसके मरने का वक़्त क़रीब आया, तो उसने अपने बेटे को पास बुलाकर कहा, “बेटा, मैं तुम्हारे लिए यह बड़ी सल्तनत छोड़े जाता हूँ। अगर सोच-समझकर चलोगे, तो तुम्हें किसी क़िस्म की दिक़्क़त पेश न आएगी। हाँ, अगर तक़दीर के फेरे से बादशाहत चली जाए, तो फ़िक्र न करना। हमारे गुलबाग़ में एक बहुत बड़ा दफ़ीना है, उससे तुम ऐसी ही और सल्तनत ख़रीद सकोगे। लो, यह गुलबाग़ की चाबी है, एहतियात से रखना। मगर देखो बेटा, गुलबाग़ में जुनूब के रुख़ जो कमरा है, उसका दरवाज़ा कभी न खोलना।”
बादशाह मर गया और उसका बेटा बादशाह बना। वह बड़ी आन-बान के साथ हुकूमत करने लगा। हँसी, खेल, नाच, तमाशे और ख़ैरात में वह मिट्टी की तरह मोहरें लुटाने लगा। ख़र्च का यह हाल था कि दिन-रात किसी वक़्त भी ख़ज़ाने का मुँह बंद न होता। ग़रीब ख़ज़ांची को दम मारने की भी मोहलत न मिलती। इस तरह फ़िज़ूल ख़र्ची से थोड़े ही दिनों में बादशाहत का टाट उलट हो गया।
अब बादशाह ने वज़ीर को गुलबाग़ की चाबी देकर कहा, “वज़ीर साहब! गुलबाग़ का दरवाज़ा खोलकर देखो तो वहाँ क्या है?”
वज़ीर गुलबाग़ से मन-ओं सोना, चाँदी, हीरे, मोती और मोहरें लाने लगा। अब क्या था? फिर वही पहले जैसी शान ओ शौकत के साथ हुकूमत! लेकिन इस तरह यह दौलत भी कितने दिन काम दे सकती थी? थोड़े ही दिनों में गुलबाग़ की माल ओ दौलत भी हवा हो गई।
एक रोज़ बादशाह ने मोहरें मँगवाईं, तो वज़ीर ने खुद हाज़िर होकर कहा, “हुज़ूर! अब ख़ज़ाने में कुछ भी नहीं है, सब ख़त्म हो गया।”
बादशाह ने हैरत में आकर कहा, “ऐं! सब ख़त्म हो गया? इतनी जल्दी? हमें तो अभी बहुत रुपये की ज़रूरत है। हमारे वालिद क्या ख़ाक सल्तनत छोड़ गए थे!”
वज़ीर ने नीची निगाह करके कहा, “जहाँपनाह! अब तो कुछ भी नहीं है।”
अब तक बादशाह था, अब हो गया फ़क़ीर। बड़ी तकलीफ़ से दिन गुज़रने लगे। अब उसके यहाँ न नाच-रंग होता, न झाड़-फ़ानूस रोशन होते, न गाना-बजाना होता। बेचारा बादशाह बड़ा उदास रहने लगा। अब क्या करें?
एक रोज़ बादशाह ने वज़ीर को तड़के ही बुला भेजा। उसके आने पर कहा, “चलिए वज़ीर साहब, आज गुलबाग़ की सैर कराएँ।”
दोनों चहल-क़दमी करने लगे। टहलते-टहलते जब जुनूब के कमरे के पास पहुँचे, तो बादशाह ने कहा, “अच्छा वज़ीर साहब, यह तो बतलाइए कि अब्बा जान ने इस कमरे का दरवाज़ा खोलने से क्यों मना किया था?”
वज़ीर बोला, “हुज़ूर! मुझे तो कुछ इल्म नहीं है।”
बादशाह ने कहा, “अच्छा, खोलकर तो देखो।”
वज़ीर ने कहा, “हुज़ूर! ऐसी क्या ज़रूरत है? बादशाह सलामत मना कर गए हैं, तो इसे न खोलना ही अच्छा है।”
बादशाह ने कहा, “नहीं वज़ीर साहब! देखना चाहिए कि इस मकान के अंदर क्या है। मुमकिन है इसके अंदर ऐसा ख़ज़ाना हो कि और भी दो-चार सल्तनतें ख़रीदी जा सकें। हमारे वालिद क्या कोई ऐसे-वैसे बादशाह थे कि चंद ही रोज़ में उनकी तमाम दौलत ख़त्म हो जाए!”
वज़ीर जब दरवाज़ा खोलने पर राज़ी न हुआ, तो बादशाह उसके हाथ से चाबी लेकर खुद ही उसे खोलने लगा। खोलते वक़्त वह सोच रहा था कि मकान के अंदर मालूम नहीं कैसा अजीब तमाशा नज़र आएगा। शायद सोना, चाँदी, हीरे, लाल, पन्ना, मोती बग़ैरा जवाहरात के ढेर देखकर आँखें चुंधिया जाएँ।
लेकिन दरवाज़ा खुलने पर देखा कि कमरा बिल्कुल खाली पड़ा है, वहाँ कुछ भी नहीं! एक कोने में एक दुबली सी मुर्गी बैठी है, जिसे बहुत दिनों से खाने को कुछ नहीं मिला।
बादशाह ने हँसकर उस मुर्गी को उठा लिया और कहा, “वज़ीर साहब! नई बादशाहत तो नहीं मिली, बादशाह के खाने के लिए यह फ़ाक़ों की मारी हुई मुर्गी मिली है। ख़ैर, जाओ आज हमारे लिए इस मुर्गी के कबाब और चपातियाँ पकवा लाओ, आज यही खाना तैयार हो।”
अब बादशाह तो गुलाब के फूलों की ख़ुशबू सूँघता हुआ बाग़ में टहलने लगा और वज़ीर मुर्गी लेकर सोचने लगा कि इसका कबाब तो बन जाएगा, लेकिन चपातियाँ कहाँ से आएँगी? एक काम करता हूँ, मुर्गी को बेच देता हूँ। जो पैसे मिलेंगे, उनमें से एक छोटी सी मुर्गी लेकर तो कबाब बना लूँगा और जो पैसे बग़ैर ख़र्च के बच जाएँगे, उनकी चपातियाँ मोल ले लूँगा।
यह सोचकर वज़ीर मुर्गी बेचने को बाज़ार गया। वहाँ एक मुल्ला की दुकान थी। वह ऐसा इल्म जानता था जिससे यह पता लग जाता कि माल ओ दौलत ज़मीन में कहाँ-कहाँ गड़े हैं। लेकिन यह किसी को भी मालूम न था कि मुल्ला में यह सिफ़त है।
वज़ीर ग्राहक की तलाश में मुल्ला की दुकान पर पहुँचा और बोला, “मुर्गी ख़रीदोगे?”
मुल्ला ने कहा, “दें, देखें कैसी मुर्गी है।”
वज़ीर ने मुल्ला के हाथ में मुर्गी दे दी। वह देखते ही ताड़ गया कि यह कोई मामूली मुर्गी नहीं, इसके पेट में तो ख़ास चीज़ है! उसने बात छुपाकर कहा, “भाई, यह तो बिल्कुल दुबली-पतली है।”
मोल-तोल करके उसने छह आने में सौदा कर लिया। फिर उसने अपने लड़के को बुलाकर कहा, “इस मुर्गी को झटपट घर ले जा। इसको किसी चीज़ से ढाँपकर इस तरह रख देना कि दूसरी मुर्गियों में न मिलने पाए।”
मुर्गी लेकर लड़का घर की तरफ़ चल दिया। उधर वज़ीर सारे बाज़ार में चक्कर लगा आया, मगर उसे कहीं छह आने से कम क़ीमत की मुर्गी न मिली। अब फिरता-फिराता वही मुल्ला ही के मकान के सामने से निकला। देखा कि एक लड़का हाथ में मुर्गी लिए दरवाज़े पर खड़ा है।
वज़ीर ने उससे पूछा, “कोई मुर्गी बिकऊ है?”
लड़के ने कहा, “हाँ।”
वज़ीर बोला, “दाम बतलाओ।”
लड़के ने कहा, “छह आना।”
वज़ीर बोला, “इससे कम दामों की मुर्गी नहीं है?”
लड़का बोला, “नहीं।”
वज़ीर सोचने लगा कि छह आने से कम में तो कोई मुर्गी मिलती ही नहीं। क्या करूँ? जाने भी दो, इसी मुर्गी को लिए लेता हूँ। बादशाह से कह दूँगा चपातियाँ नहीं हैं, सिर्फ़ कबाब ही खा लीजिए।
वज़ीर ने लड़के से कहा, “अच्छा लाओ, एक मुर्गी दे दो।”
लड़के ने सोचा कि अब कौन अंदर जाए और दूसरी मुर्गी ढूँढे, इसलिए उसने वही वज़ीर वाली मुर्गी फिर वज़ीर को दे दी।
कुछ देर बाद मुल्ला बाज़ार से घर आया, तो लड़के से बोला, “अरे ला, वह मुर्गी कहाँ है?”
लड़का एक मुर्गी उठा लाया। उसको देखकर मुल्ला ने सर उठाया और कहा, “यह तो वह मुर्गी नहीं है! अबे, वह मुर्गी क्या हुई?”
लड़का बोला, “यही तो है।”
मुल्ला और कुछ न बोला। उसने सोचा कि और ज़्यादा पूछताछ करने से लड़के को शक हो जाएगा। अपने इल्म के ज़ोर से उसने पता लगा लिया कि मुर्गी जिसकी थी, उसी के पास पहुँच गई।
वज़ीर लौटकर गुलबाग़ में पहुँच गया। मुर्गी को चीर-फाड़कर तालाब के घाट पर धोने लगा। सामने के घाट पर बादशाह बैठा था। धोते-धोते मुर्गी के पेट में से एक अंगूठी निकल पड़ी। उसे देखकर वज़ीर ने कहा, “वाह! अंगूठी तो उम्दा है।”
अब उसने अंगूठी को उंगली में पहन लिया। अंगूठी का पहनना था कि मालूम नहीं कहाँ से दो डरावनी सूरत जिन आकर सामने खड़े हो गए और सलाम करके बोले, “हुज़ूर! क्या चाहिए? फ़रमाइए।”
वज़ीर फ़रमाइश तो क्या करता, उनकी डरावनी सूरत देखते ही मारे डर के चिल्ला उठा। उसने अंगूठी फ़ौरन उंगली से उतारकर पानी में फेंक दी। दोनों जिन उसी दम ग़ायब हो गए।
वज़ीर की चीख़ सुनकर बादशाह वहाँ आ गया। उसने पूछा, “क्या हुआ वज़ीर साहब? क्या हुआ? इस तरह चिल्ला क्यों उठे?”
वज़ीर ने कहा, “हुज़ूर! मुर्गी के पेट में से एक अंगूठी निकली थी। ज्यों ही मैंने उसे पहना, दो डरावनी सूरतें मेरे सामने आ खड़ी हुईं। उन्होंने मुझसे कहा क्या चाहिए? मैंने डरकर अंगूठी फ़ौरन पानी में फेंक दी, बस वह सूरतें ग़ायब हो गईं।”
बादशाह कुछ भी न बोला। ढूँढकर पानी में से अंगूठी निकाल लाया। फिर उसने वज़ीर से कहा, “अब मैं कबाब-रोटी नहीं खाऊँगा, यहाँ से चलो।”
बग़ैर खाना खाए वह वज़ीर के साथ महल को चला आया।
रात को जब वज़ीर सो गया, तो बादशाह ने वह अंगूठी उंगली में पहन ली। फ़ौरन दोनों जिन हाज़िर हो गए। उन्होंने कहा, “हुज़ूर! क्या चाहिए? फ़रमाइए।”
बादशाह ने कहा, “जैसी हमारी बादशाहत थी, दिन चढ़ने से पहले-पहले फिर वैसा ही बना दो। फ़ीलख़ाने में हाथी, अस्तबल में घोड़े, लाव-लश्कर, नौकर-चाकर सब मौजूद हो जाएँ। मतलब यह कि पहले जैसा ठाट-बाट फिर मुहैया कर दो।”
जिन बोले, “जो हुक्म!”
अभी सुबह न हुई थी कि पहले का साज़ ओ सामान मुहैया हो गया।
रात को वज़ीर टूटे-फूटे मकान में एक टूटी सी ख़टिया पर सोया था। सुबह आँख खुलते ही उसने देखा कि सोने के पलंग पर लेटा हुआ है। उसने सोचा, ‘मैं क्या ख़्वाब देख रहा हूँ!’
उठकर दरवाज़ा खोला तो देखा कि सारे घर की सूरत ही बदली हुई है। सब बातें पहले जैसी हो गई हैं। कचहरी में गया तो देखा कि बादशाह तख़्त पर बैठा दरबार कर रहा है। वज़ीर आदाब बजा लाकर रू-ब-रू खड़ा हो गया।
बादशाह ने कहा, “वज़ीर साहब! पहले जिस तरह तुम हमारी वज़ारत करते थे, इसी तरह अब फिर करो।”
वज़ीर सर झुकाकर बोला, “जो हुक्म!”
बादशाह अब पहले से भी ज़्यादा शान ओ शौकत के साथ हुकूमत करने लगा। अब किसी बात का फ़िक्र न था। जब माल ओ दौलत ख़त्म हो जाती, तो दोनों जिन और लाकर हाज़िर कर देते। बहुत दिन तक बादशाहत करते-करते बादशाह का जी भर गया।
एक रोज़ उसने वज़ीर को बुलाकर कहा, “वज़ीर साहब! अब कुछ दिन तक तुम बादशाहत सम्हालो, मैं देस-विदेस की सैर करने जाता हूँ।”
वज़ीर ने सलाम करके जवाब दिया, “जो हुक्म!”
बादशाह अगले ही दिन फ़क़ीर का भेष बनाकर सैर के लिए रवाना हो गया। मुल्क-मुल्क की सैर करता बहुत दिन के बाद एक नए मुल्क में पहुँचा। शहर में दाख़िल होने लगा, तो देखा कि फाटक के पास एक बड़ा सा सुर्ख़ रंग का इश्तहार लगा हुआ है। पास ही एक नक़्कारा रखा है।
इश्तहार में यह इबारत दर्ज थी: ‘जो शख़्स एक बार में 16 मन चावल और दाल-तरकारी खा जाएगा और एक तीर से दो ताड़ के दरख़्तों को चीरकर हीरे के तोतों को मार डालेगा, उसके साथ उस मुल्क की बादशाहज़ादी का ब्याह कर दिया जाएगा। लेकिन अगर कोई शख़्स यह काम करने का दावा करके नहीं कर सका, तो उसे बादशाहज़ादी का घसियारा बनकर रहना पड़ेगा।’
इश्तहार पढ़कर बादशाह ने सोचा, ‘देखना चाहिए यह बादशाहज़ादी कैसी है।’ उसके बाद उसने फ़ौरन नक़्कारा बजा दिया और इश्तहार को फाड़कर उसके टुकड़े हवा में बिखेर दिए।
नक़्कारे की आवाज़ सुनते ही उस सल्तनत के सिपाही आन मौजूद हुए। देखा कि एक फ़क़ीर मौजूद है। उसे पकड़कर बादशाह के दरबार में ले गए।
बादशाह ने पूछा, “तुमने नक़्कारा बजाया था, इश्तहार पढ़ लिया है न?”
फ़क़ीर बोला, “जी हाँ, हुज़ूर!”
बादशाह बोला, “तो इश्तहार में जिन कामों का ज़िक्र दर्ज है, वह सब कर सकते हो?”
फ़क़ीर ने जवाब दिया, “अगर न कर सकता, तो डंका ही क्यों बजाता?”
बादशाह ने कहा, “अगर न कर सके तो?”
फ़क़ीर बोला, “तो बादशाहज़ादी के अस्तबल में घसियारा बनकर रहूँगा।”
“अच्छा,” कहकर बादशाह ने तैयारी का हुक्म दे दिया।
दूसरे मुल्कों के बादशाहों को भी आने की दावत दी गई। वह सब आकर जमा हुए, बड़ा भारी दरबार लगा। सल्तनत की रिआया भी तमाशा देखने को आई।
दरबार में 16 मन चावल और दाल-तरकारी रख दी गई। दाल-चावल के पहाड़ के सामने ही फ़क़ीर खाने बैठ गया। सब लोग हैरत के साथ देखने लगे कि एक आदमी इस क़दर दाल-चावल किस तरह खा जाएगा। कैसे ताज्जुब की बात है कि देखते ही देखते सारी दाल, चावल और तरकारी ख़त्म हो गई! यह बात किसी देखने वाले की समझ में न आई कि किस तरह इतना सामान फ़क़ीर के पेट में समा गया।
असल में फ़क़ीर बादशाह ने दोनों जिन्नों को पहले ही हुक्म दे रखा था कि वही आकर सब सामान खा गए, लेकिन किसी को नज़र नहीं आए। इसलिए सबको यही मालूम हुआ कि अकेला फ़क़ीर सब सामान हड़प कर गया।
अब फ़क़ीर ने एक तीर से ताड़ के दोनों दरख़्तों को चीरकर हीरे के तोते को मार गिराया। यह काम भी जिन्नों ने ही किया था, मगर इस तरह छुपकर कि हर शख़्स को सारी करामात फ़क़ीर ही की नज़र आई। चारों तरफ़ वाह-वाह होने लगी। हाथ पकड़कर फ़क़ीर को बादशाह बड़ी इज़्ज़त के साथ महल के अंदर ले गया।
जब बादशाहज़ादी के साथ उसका ब्याह होने का वक़्त क़रीब आया, तो फ़क़ीर ने कहा, “मैं अभी शादी नहीं करूँगा, मैंने एक क़सम खा रखी है।”
बादशाहज़ादी के बाप ने पूछा, “वह क्या है?”
फ़क़ीर ने कहा, “जो शहज़ादे बादशाहज़ादी के साथ शादी करने आए थे और उसके घसियारे बन गए हैं, उन सबको मैं अपने हाथ से रिहा कर देना चाहता हूँ।”
बादशाह बोला, “बहुत अच्छा।”
इस पर फ़क़ीर बादशाह ने अस्तबल में जाकर सब शहज़ादों को रिहा कर दिया और वह सब उसकी फ़तेह के नारे बुलंद करके अपने-अपने मुल्क को वापस चले गए। अब फ़क़ीर बादशाह शहज़ादी से शादी करके ख़ुसुर के यहाँ इज़्ज़त के साथ रहने लगा।
अब इधर की बातें इधर सुनो। जब से मुल्ला ने मुर्गी देखी थी, उसका दिल अंगूठी ही में पड़ा था। उसने अपने इल्म के ज़ोर से यह मालूम कर लिया कि अंगूठी बादशाह के पास है। लेकिन बादशाह बहुत दूर था, वहाँ तक पहुँचने में बहुत दिन लगते। इसलिए वह मुंतज़िर था कि बादशाह लौटकर अपने मुल्क में कब आता है। लेकिन बादशाह आता ही न था।
तब मुल्ला ने बादशाह के ससुराल ही चलने की ठानी। उसने बहुत से कुत्ते, बिल्लियाँ और बंदर मोल लिए और उनका तमाशा दिखाने के बहाने डुगडुगी बजाता हुआ सफ़र करने लगा। गाँव के बाद गाँव, बस्ती के बाद बस्ती पार करता हुआ वह बादशाह के ख़ुसुर के मुल्क में जा पहुँचा। वहाँ वह अपने जानवरों का नाच-तमाशा दिखाता गली-गली और बाज़ार-बाज़ार फिरने लगा।
एक रोज़ बादशाहज़ादी की सहेलियों ने कहा, “बादशाहज़ादी! चंद रोज़ से शहर में एक परदेसी मदारी आया है, उसके साथ बहुत से जानवर हैं जिनका वह तमाशा दिखलाता है। वह जानवर इस मुल्क में नहीं पाए जाते।”
बादशाहज़ादी बोली, “सचमुच? अच्छा तो उसे बुलाओ, मैं तमाशा देखूँगी।”
सहेलियाँ मुल्ला को बुला लाँईं। उसी वक़्त फ़क़ीर बादशाह कपड़े बदलकर सैर करने जा रहा था। यूँ तो उसका क़ायदा था कि जब कपड़े बदलता, तो अंगूठी को मैले चोगे की जेब से निकालकर नए चोगे की जेब में रख लेता था। लेकिन आज मालूम नहीं कैसे यह काम करना भूल गया। मुल्ला ने अपने इल्म से यह बात मालूम कर ली थी।
तक़दीर से वह उसी वक़्त महल में पहुँचा। बादशाहज़ादी नए जानवरों का नई क़िस्म का नाच देखकर बहुत ख़श हुई और सोने के तश्त में अशर्फ़ियाँ भरकर मुल्ला को देने लगी। लेकिन मुल्ला ने कहा, “मुझे रुपया-पैसा नहीं चाहिए।”
बादशाहज़ादी ने पूछा, “तू क्या लेगा?”
मुल्ला ने कहा, “कोई फटा-पुराना चोग़ा मिल जाए।”
बादशाहज़ादी ने लौंडी से कहा, “जा तो, एक चोग़ा ले आ।”
लौंडी ने बादशाह के ग़ुस्लख़ाने में जाकर देखा कि एक चोग़ा खूँटी पर लटक रहा है, उसने वही चोग़ा लाकर मुल्ला को दे दिया। उसे लेकर मुल्ला ख़ुशी-ख़ुशी चला गया। शहर-पनाह के फाटक से बाहर पहुँचते ही उसने अपने जानवरों को छोड़ दिया और चोग़ा लेकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ।
भागते-भागते जब दूर निकल गया और पकड़े जाने का डर न रहा, तो अंगूठी देखने को दिल चाहा। उस वक़्त वह एक दरिया उबूर कर रहा था। उसने चोगे की जेब से ज्यों ही अंगूठी निकाली, वह उसके हाथ से छूटकर पानी में जा पड़ी। एक बड़ी सी मछली आकर फ़ौरन उस अंगूठी को निगल गई। मुल्ला ने पनडुब्बी की तरह पानी में डुबकी लगाकर अंगूठी को बहुत तलाश किया, लेकिन वह क्यों मिलने लगी? लाचार मुल्ला अपना सर पीटता घर लौट गया।
इधर टहलते-टहलते फ़क़ीर बादशाह को यकायक अंगूठी का ख़याल आया। उसने जेब में हाथ डाला तो देखा कि अंगूठी नहीं है। फ़ौरन महल को लौट आया और सीधा ग़ुस्लख़ाने में गया। वहाँ देखा कि पुराना चोग़ा मौजूद नहीं। तब वह तेज़ी से बादशाहज़ादी के पास गया और उससे पूछा, “नहाने के कमरे में हमारा चोग़ा टँगा था, वह क्या हुआ?”
बादशाहज़ादी बोली, “वह तो मैंने एक मदारी को दे दिया।”
बादशाह ने कहा, “सब चौपाट हो गया! उसकी जेब में हमारी अंगूठी थी।”
बादशाहज़ादी ने कहा, “एक अंगूठी चली गई तो क्या हुआ? इतनी सी बात से तुम्हारा चेहरा क्यों उतर गया?”
बादशाह कहने लगा, “वह मामूली अंगूठी न थी, उसके जोड़ की अंगूठी दुनिया भर में नहीं मिलेगी।”
बादशाहज़ादी ने पूछा, “वह किस क़िस्म की अंगूठी थी?”
बादशाह ने कहा, “वह हमारी बादशाही अंगूठी थी, उससे हज़ारों बादशाहतें ली जा सकती थीं। हाय! हमारी बादशाही अंगूठी!”
अंगूठी के लिए बादशाह दीवाना सा हो गया। ख़ुसुर ने आकर उसे हीरे, पन्ने, मोती बग़ैरा जवाहरात की मालूम नहीं कितनी अंगूठियाँ दिखलाईं, लेकिन उसने एक को भी न छुआ। महल को छोड़कर, बेगम को छोड़कर और सब कुछ छोड़-छाड़कर हाय-हाय करता बाहर चल दिया।
चलते-चलते जब बहुत थक गया और आगे न चल सका, तो एक मकान के चबूतरे पर जाकर पड़ रहा। वह मकान एक माहीगीर का था। माहीगीर के बहुत से लड़के-बच्चे थे, ग़रीबी के मारे उसके दिन बड़ी मुश्किल से कटते थे। हर रोज़ वह दरिया से जो मछलियाँ पकड़कर लाता, उन्हीं को बेचकर गुज़र करता था।
बादशाह जिस रोज़ माहीगीर के चबूतरे पर आकर लेटा, उस रोज़ माहीगीर को बहुत सी मछलियाँ मिल गईं। इसलिए वह ख़ुशी-ख़ुशी घर आया और अपनी बीवी से बोला, “दरवाज़े पर यह जो पागल पड़ा है, उसका आना हमारे लिए बहुत अच्छा साबित हुआ। इसलिए इसकी ख़ुशामद करती रहना ताकि यह भाग न जाए।”
माहीगीर की बीवी ने जाकर बादशाह से नहाने-खाने को बहुत कहा-सुना, लेकिन न तो वह बोला और न अपनी जगह से हटा, वहीं लेटा-लेटा मालूम नहीं क्या-क्या सोचता रहा।
उस रोज़ भी बहुत सी मछलियाँ माहीगीर के हाथ आईं। वह सोचने लगा कि अगर यह दीवाना कुछ दिन और हमारे यहाँ ठहरा रहे, तो इसकी बरकत से मैं मछलियाँ बेच-बेचकर कुछ रक़म जमा कर लूँगा। इसलिए उसने अपनी घरवाली से फिर कहा, “इस दीवाने की ऐसी ख़िदमत कर कि यहाँ से इसका जी जाने को न चाहे।”
माहीगीर की बीवी ने बादशाह की ख़ातिर-मुदारात करनी चाही, लेकिन बेकार! वह न तो मुँह से कुछ बोलता, न वहाँ से हिलता और न खाता-पीता।
अगले दिन जब माहीगीर दरिया को गया, तो फिर बहुत सी मछलियाँ उसके हाथ लगीं। उनमें से एक मछली बहुत बड़ी और मोटी-ताज़ी थी। जब वह घर आया तो उसकी लड़की ने कहा, “अब्बा! इस बड़ी मछली को बेचने मत ले जाओ, इसे घर ही में रहने दो, हम इसे पकाकर खाएंगे।”
माहीगीर ने वह मछली लड़की को दे दी, ख़ाली मछलियाँ लेकर वह बेचने को बाज़ार में चला गया।
इधर लड़की उस मछली को काटने-धोने के लिए जोहड़ के किनारे जा बैठी। मछली काटते ही उसके पेट से एक अंगूठी निकली। ख़ुशनुमा चमचमाती अंगूठी देखकर लड़की को बड़ी ख़ुशी हुई। उसने ख़ूब अच्छी तरह से देखकर अंगूठी पहन ली।
पहनने की देर थी कि दोनों जिन आ हाज़िर हुए और बोले, “क्या चाहिए? फ़रमाइए।”
उनकी डरावनी सूरत देखकर लड़की मारे डर के चीख़ उठी। उसने अंगूठी उतारकर पानी में फेंक दी।
चीख़ सुनते ही बादशाह गिरता-पड़ता लड़की की तरफ़ दौड़ गया। उसके देखते-देखते दोनों जिन ग़ायब हो गए। बादशाह ताड़ गया कि मामला क्या है। लड़की से कुछ पूछताछ किए बग़ैर वह चुपचाप उसी जगह बैठ गया।
लड़की ने कहा, “माँ! क्या कहूँ? सुनकर तुम्हें यक़ीन नहीं आएगा। मैंने मछली का पेट फाड़ा तो उसमें से एक अंगूठी निकली। आहा! कैसी आला और चमकदार अंगूठी थी, सोने की सी चमक-दमक थी। लेकिन उंगली में पहनते ही दो ख़ौफ़नाक भूत आ खड़े हुए। डर के मारे मेरे मुँह से चीख़ निकल गई, अंगूठी उतारकर मैंने उसी वक़्त पानी में फेंक दी।”
“यह सुनकर तो मेरा भी कलेजा काँप उठा, चल घर चल! दोपहर के वक़्त यहाँ मत ठहर,” यह कहकर वह बेटी को घर ले गई।
बादशाह क़रीब ही छुपा हुआ सब बातें सुन रहा था। जब माँ-बेटी दोनों वहाँ से चली गईं, तो वह जोहड़ में घुसा। गोता लगाकर आख़िर उसने अंगूठी ढूँढ ही ली। अंगूठी लेकर बादशाह फिर माहीगीर के चबूतरे पर जा बैठा।
मछलियाँ बेचकर माहीगीर आँटी में रुपया-पैसा लगाकर ख़ुश-ख़ुश घर आया। बादशाह को देखकर उसने कहा, “बाबा! तीन दिन से तुम हमारे यहाँ ठहरे हो, लेकिन न नहाते-खाते और न कुछ और करते हो। इस तरह किसी बाल-बच्चेदार आदमी के दरवाज़े पर फ़ाक़े करना उसका बुरा मनाना है। इसलिए आज तो तुम्हें नहा-धोकर थोड़ा-बहुत खाना ही पड़ेगा।”
बादशाह ने हँसकर जवाब दिया, “अच्छा चल, आज तेरे कहने से मैं नहाऊँगा और खाऊँगा भी।”
माहीगीर बादशाह को नहलाने और खाना खिलाने ले गया।
बादशाह खा-पीकर रात को लेट गया। आधी रात के वक़्त जब सब सो गए, तो बादशाह ने उठकर अंगूठी पहन ली। दोनों जिन हाज़िर होकर बोले, “क्या चाहिए? फ़रमाइए।”
बादशाह ने कहा, “यह माहीगीर बहुत ग़रीब है। आज रात को इसके लिए एक आलीशान मकान तामीर कर दो और एक कमरा अशर्फ़ियों से भर दो।”
“जो हुक्म!” कहकर जिन चले गए।
माहीगीर जब सुबह के वक़्त सोकर उठा, तो यह तमाशा देखकर भौचक्का सा रह गया। उसकी समझ में कुछ भी न आया कि यह क्योंकर ज़ुहूर में आया। दीवाने की तलाश की गई तो मालूम हुआ कि वह भी नहीं है। माहीगीर ने सोचा कि वह दीवाना ज़रूर कोई देवता था, दीवाने के भेष में हमारे यहाँ आया था, उसी की इनायत से हमें यह माल ओ दौलत मिला है।
अंगूठी लेकर बादशाह अपने ख़ुसुर के मुल्क की तरफ़ चल दिया। सास-ससुर ने जब सुना कि दामाद लौट आया है और देखा कि अब उसके सर पर सिंक सवार नहीं, तो उन्हें बड़ी ख़ुशी हुई।
ससुर ने कहा, “एक अंगूठी के लिए तुम पागल हो गए थे?”
बादशाह बोला, “वह क्या कोई मामूली अंगूठी थी? एक दफ़ा पहनकर तो देखिए।”
ससुर ने अंगूठी लेकर उंगली में पहन ली। उसके बाद जो कुछ वाक़िया हुआ, उसके कहने की ज़रूरत नहीं! बुड्ढे को मारे ख़ौफ़ के ग़श आ गया। मुँह पर पानी के छींटे दिए गए, तो जाकर कहीं उसे होश आया।
चंद रोज़ बाद दामाद ने बातों-बातों में कहा कि अब हम अपने वतन को जाएँगे।
यह सुनकर ससुर ख़ुशी से बोला, “अच्छी बात है जाओ, अपने साथ घोड़े, हाथी, लाव-लश्कर लेते जाओ।”
“नहीं, मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं,” यह कहकर दामाद ख़ामोश हो रहा।
ससुर ने सोचा कि यह ग़रीब आदमी है, इसलिए डरता है कि इन सबके खाने को कहाँ से आएगा। दामाद ससुर के दिल की बात ताड़ गया, बस मुस्कुराकर चुप हो रहा।
रात को जब सब सो गए, बादशाह ने अंगूठी पहन ली। फ़ौरन दोनों जिन हाज़िर हो गए। बादशाह ने हुक्म दिया, “हमें और हमारी मलका को हमारे पाया-तख़्त में पहुँचा दो।”
तब एक जिन ने बादशाह को और दूसरे ने मलका को उठाकर उनके पाया-तख़्त में पहुँचा दिया।
बादशाह फिर मनमाने ढँग से हुकूमत करने लगा। एक सल्तनत बर्बाद हो जाती, तो जिन दूसरी सल्तनत हाज़िर कर देते। एक अरसे के बाद बादशाह बूढ़ा होकर मर गया। तब दोनों जिन उस अंगूठी को ले गए। उन्होंने उसे कहीं छुपा दिया। बार-बार नई सल्तनतें बनाते-बनाते उनका नाक में दम आ गया था, इसीलिए उन्होंने अंगूठी छुपा दी। वह दोनों दिन-रात इस बात की ख़बर रखते कि उसे कोई उड़ा न ले जाए।
बहुत से हुनरमंद लोगों ने इल्म के ज़ोर से उस अंगूठी का पता लगाने की कोशिश की, मगर पता किसी को न लगा।
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सबक़
- फ़िज़ूल ख़र्ची का बुरा अंजाम: बेहिसाब और बग़ैर सोचे-समझे ख़र्च करने से बड़ी से बड़ी सल्तनत और ख़ज़ाना भी ज़्यादा देर क़ायम नहीं रहता।
- बुज़ुर्गों की नसीहत पर अमल: वियत और हिदायत को नज़रअंदाज़ करने से इंसान मुश्किलों में पड़ सकता है, जैसा कि बादशाह ने अपने वालिद के मना करने के बावजूद कमरा खोलकर देखा।
- ग़रीबों की मदद और एहसानमंदी: बादशाह ने मुश्किल वक़्त में पनाह देने वाले ग़रीब माहीगीर की ग़रीबी दूर करके एहसान का बदला भलाई से दिया।
- क़नाअत और तक़दीर पर यक़ीन: इंसान चाहे जितना चालाक बने या इल्म का दावा करे (जैसे मुल्ला), जो चीज़ जिसकी क़िस्मत में होती है, वह उसी तक पहुँचती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
सवाल 1: ‘क़िस्सा बादशाही अंगूठी’ से हमें क्या अहम सबक़ मिलता है?
जवाब: इस क़िस्से से हमें कई अहम सबक़ मिलते हैं- जैसे फ़िज़ूल ख़र्ची से बचना, बुज़ुर्गों की नसीहतों का एहतराम करना, और मुश्किल वक़्त में सब्र व अक्लमंदी से काम लेना। इसके अलावा यह कहानी सिखाती है कि इंसान की तक़दीर में जो चीज़ लिखी होती है, वह उस तक पहुँच ही जाती है।
सवाल 2: बादशाह की सल्तनत पहली बार क्यों बर्बाद हुई थी?
जवाब: बादशाह अपने वालिद के इंतिक़ाल के बाद बेहद फ़िज़ूल ख़र्च हो गया था। उसने खेल-तमाशे, नाच-गाने और बेहिसाब ख़ैरात में मोहरें मिट्टी की तरह बहा दीं, जिसकी वजह से उसका पूरा ख़ज़ाना ख़ाली हो गया और सल्तनत बर्बाद हो गई।
सवाल 3: वज़ीर को मुर्गी के पेट से क्या मिला था और उसका क्या असर हुआ?
जवाब: वज़ीर को मुर्गी का पेट साफ़ करते वक़्त एक तिलिस्मी अंगूठी मिली। जब उसने वह अंगूठी अपनी उंगली में पहनी, तो फ़ौरन दो डरावने जिन हाज़िर हो गए, जो अंगूठी पहनने वाले की हर फ़रमाइश और हुक्म पूरा करने के लिए पाबंद थे।
सवाल 4: मुल्ला (मदारी) ने बादशाह से अंगूठी किस तरह हासिल की?
जवाब: मुल्ला अपने इल्म के ज़ोर से जान गया था कि अंगूठी चोगे की जेब में है। जब बादशाह अंगूठी नए चोगे में रखना भूल गया, तो मुल्ला ने तमाशा दिखाकर इनाम के तौर पर पैसों की जगह बादशाह का वही पुराना चोग़ा माँग लिया और धोखे से अंगूठी हासिल कर ली।
सवाल 5: खोई हुई अंगूठी बादशाह को दोबारा कैसे मिली?
जवाब: मुल्ला के हाथ से अंगूठी दरिया में गिर गई थी जिसे एक मछली निगल गई। बाद में वह मछली एक ग़रीब माहीगीर (मछुआरे) के घर पहुँची। मछली काटने पर उसकी बेटी को अंगूठी मिली, और जब उसने डरकर अंगूठी पानी में फेंकी, तो पास ही छिपे बादशाह ने उसे ढूँढकर वापस हासिल कर लिया।
आख़िरी बात
दोस्तों, बादशाही अंगूठी का ये पुरअसरार और दिलचस्प क़िस्सा यहीं ख़त्म होता है। आपको ये कहानी कैसी लगी, हमें कमेंट करके ज़रूर बताइए। अगर कहानी पसंद आई हो तो इसे अपने दोस्तों तक भी पहुँचाइए और ऐसे ही मज़ीद दिलचस्प क़िस्से-कहानियों के लिए हमारे साथ जुड़े रहिए।
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