बाबा नासेह और तीन सवाल

तआरुफ़

अस्सलामु अलैकुम प्यारे दोस्तों! बाबा नासेह और तीन सवाल एक पुर-असरार क़िस्सा है, जिसमें एक बुज़ुर्ग बरसों से अपने तीन सवालों के सही जवाब तलाश रहा था। एक दिन एक ग़रीब नौजवान के जवाब ने उसकी तलाश पूरी कर दी और उसे एक बेशकीमती ख़ज़ाने के राज़ तक पहुँचा दिया। आख़िर वो तीन सवाल क्या थे और नौजवान के जवाब में ऐसा क्या था? जानने के लिए पूरा क़िस्सा पढ़िए।

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क़िस्सा: बाबा नासेह और तीन सवाल

बहुत ज़माने पहले की बात है। एक बूढ़े बुज़ुर्ग थे। बहुत पारसा और बेहद रहम-दिल। उनकी यह आदत थी कि जैसे ही सुबह होती, वो शहर के दरवाज़े पर जाकर बैठ जाते और रात तक वहीं रहते। रात को जब पहरेदार दरवाज़ा बंद करने लगता, तो वो अपने घर चले जाते। अगली सुबह वो दोबारा वापस आते और अपनी जगह बैठ जाते। यह उनका रोज़ाना का तरीक़ा था।

बूढ़े बुज़ुर्ग ख़ाली नहीं बैठते थे। बल्कि, शहर में दाख़िल होने वाले किसी भी मुसाफ़िर या अजनबी को हर तरह की नसीहत करते और उन्हें शहर के हालात से आगाह करते, ताकि मुसाफ़िर को किसी दुश्वारी का सामना न करना पड़े। वो हर किसी को नसीहत किया करते थे। यही वजह थी कि लोगों ने उन्हें बाबा नासेह कहना शुरू कर दिया। यानी, नसीहत करने वाले बाबा।

उनकी एक और आदत थी। हर नए आने वाले से तमाम गुफ़्तगू के बाद, वो ये तीन सवालात ज़रूर पूछते थे। पहला, सबसे बेहतरीन ख़ुराक कौन सी है? दूसरा, सबसे उम्दा लिबास कौन सा है? और तीसरा, सबसे बेहतरीन औरत कौन सी है? ज़्यादातर लोग इन सवालात के एक ही तरह के जवाब दिया करते थे।

बाबा नासेह आज तक इन जवाबों से मुतमइन नहीं हुए थे। यही वजह थी कि हर किसी के जवाब सुनने के बाद, बाबा उन्हें दुआएँ देते और शहर में भेज देते। साथ ही उन्हें कड़ी मेहनत करने और हमेशा सच बोलने की ताकीद करते। ख़ुलासा ये कि वो हर नए आने वाले की हौसला-अफ़ज़ाई करते थे।

इस तरह कई साल गुज़र गए। ये बाबा का रोज़ाना का तरीक़ा बना रहा। वो सुबह शहर के दरवाज़े पर बैठते, सारा दिन लोगों से मिलते, अपने सवालात दोहराते और सही जवाब न पाकर रात को घर लौट आते।

एक दिन सुबह-सवेरे बाबा दरवाज़े पर बैठे ही थे कि एक हसीन नौजवान शहर में दाख़िल होने के लिए दरवाज़े पर आया। बाबा ने उसे रोका और शहर आने का मक़सद पूछा।

नौजवान ने कहा, “बाबा, मेरे कई बच्चे हैं।”

“मैं एक ग़रीब आदमी हूँ।”

“मैं रोज़ी कमाने इस शहर में आया हूँ।”

“शायद मुझे कोई काम मिल जाए और ये ग़रीबी ख़त्म हो जाए।”

बाबा ने कहा, “अगर तुम्हें बुरा न लगे, तो क्या मैं कुछ सवालात पूछ सकता हूँ?”

“क्या पता, तुम सही जवाब दे दो और तुम्हारी पूरी ज़िंदगी आराम से गुज़र जाए।”

नौजवान पहले तो चौंका। फिर उसने कहा, “बाबा, आप यक़ीनन पूछ सकते हैं।”

“अगरचे मैं एक जाहिल, अनपढ़ आदमी हूँ।”

“लेकिन मैं कोशिश करूँगा। शायद मैं आपके सवालात के सही जवाब दे सकूँ।”

बाबा ने पूछा, “सबसे बेहतरीन ख़ुराक कौन सी है?”

“सबसे उम्दा लिबास कौन सा है?”

“सबसे बेहतरीन औरत कौन सी है?”

ये सवालात सुनकर नौजवान ने कुछ देर सोचा। फिर उसने कहा, “सुनिए जनाब, सबसे बेहतरीन ख़ुराक वो है जो भूख के वक़्त मयस्सर हो।”

“सबसे उम्दा लिबास वो है जो जिस्म को ढाँप ले, और सबसे बेहतरीन औरत वो है जिसके बारे में दानिशमंदों ने कहा है।”

“मोहब्बत करने वाला बंदर उस हिरन से बेहतर है जो सिर्फ़ दिखावा करता है।”

यह जवाब सुनकर बूढ़ा आदमी इतना ख़ुश हुआ कि नाचने लगा, जैसे उसे कोई ख़ज़ाना मिल गया हो। नौजवान उसे हैरत से देखता रहा। वो समझ नहीं पा रहा था कि ये इतनी ख़ुशी की वजह कैसे हो सकती है।

आख़िरकार, बूढ़े ने उसका हाथ थाम लिया। उसने उसे अपनी आँखों से लगाया, चूमा और कहा, “प्यारे दोस्त, तुम इतने वक़्त से कहाँ छुपे हुए थे?”

“मैं एक ज़माने से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था। कम-ओ-बेश तीस साल हो गए हैं। मैं इन्हीं जवाबों की तलाश में था जो तुमने आज मेरे सवालात के दिए हैं। अब मेरी बात ग़ौर से सुनो। तुम यहाँ रोज़ी कमाने आए हो। तो तुम्हें मुबारक हो। इस शहर में तीस साल से एक बहुत बड़ा ख़ज़ाना तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। अब मेरे साथ ख़ामोशी से चलो, ताकि मैं वो ख़ज़ाना तुम्हारे हवाले कर सकूँ और सुकून से मर सकूँ।”

यह कहकर बूढ़ा आदमी शहर की एक सड़क पर चल पड़ा। नौजवान भी ख़ामोशी से उसके पीछे चलने लगा। चलते-चलते दोनों एक खंडहर महल में पहुँचे। उस महल के बीचों-बीच एक हौज़ था। उसका पानी नीला और बहुत ठंडा था।

हौज़ के पास पहुँचकर बूढ़े ने नौजवान से दोबारा कहा, “अब मेरी बात सुनो और मेरी बातों को दिल से लगा लो।”

“ख़बरदार, मेरी हिदायत के ख़िलाफ़ मत जाना, वरना अपनी जान गँवा बैठोगे। और अगर तुमने मेरी बातों पर अमल किया, तो तुम ख़ज़ाने के मालिक बन जाओगे। तुम्हें अपने तमाम कपड़े उतारने होंगे और इस हौज़ में गोता लगाना होगा।

इसके पेंदे में तुम्हें एक बिल्कुल सूखा, बंजर मैदान मिलेगा। वहाँ किसी भी क़ीमत पर मत रुकना। आगे बढ़ते रहना। तरह-तरह के साँप, बिच्छू, शेर और अज़दहे तुम्हारी तरफ़ बढ़ेंगे और ऐसा लगेगा जैसे वो तुम पर हमला करने वाले हैं। लेकिन वो तुम्हें ज़रा भी नुक़सान नहीं पहुँचा सकेंगे। हाँ, अगर तुम डर गए, रुक गए या पीछे मुड़कर देखा, तो तुम उन दरिंदों का शिकार बन जाओगे।”

“जैसे-जैसे तुम चलोगे, तुम्हें सफ़ेद चमकते पत्थर का बना एक दरवाज़ा नज़र आएगा। एक काला पहरेदार उस दरवाज़े पर पहरा दे रहा होगा। वो तुम्हें देखते ही ज़ोर से चिल्लाएगा, ‘तुम्हें यहाँ किसने भेजा है?’ तुम्हें पूरे सुकून के साथ जवाब देना होगा, ‘बाबा नासेह ने मुझे यहाँ भेजा है।’ तुम्हें बिल्कुल ऐसे ही सात दरवाज़ों का सामना करना पड़ेगा। सातवें दरवाज़े पर भी यही होगा। तुम मेरा नाम लेकर हर एक से गुज़र जाओगे। फिर सब कुछ तुम पर ज़ाहिर हो जाएगा।”

पहले तो नौजवान बूढ़े आदमी के चेहरे और उसकी बातों की सच्चाई से इतना मुतास्सिर हुआ कि आख़िरकार उसे उस पर यक़ीन करना ही पड़ा। उसने सोचा, “मैं बहुत अच्छा तैराक हूँ।”

“मैं गोताख़ोर भी हूँ।”

“तो अपनी क़िस्मत आज़माने में क्या हर्ज़ है?”

उसने अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए। तमाम कपड़े उतारकर और सिर्फ़ एक जांघिया पहनकर, उसने बिस्मिल्लाह कहा, हौज़ में छलांग लगा दी और सीधा पेंदे में चला गया।

बाबा नासेह की हिदायत पर अमल करते हुए, वो ख़तरनाक साँपों और शेरों से बचता हुआ आख़िरकार महल के दरवाज़े तक पहुँच गया। एक बेहद हट्टा-कट्टा, काले रंग का हबशी पहरेदार वहाँ पहरा दे रहा था। जैसे ही पहरेदार ने उसे देखा, उसने उसे डाँटा और पूछा।

“ऐ नौजवान, तुम्हें यहाँ किसने भेजा है?”

वो न तो डरा और न ही सहमा, बल्कि बिल्कुल पुरसुकून होकर जवाब दिया।

“बाबा नासेह ने मुझे यहाँ भेजा है।”

यह सुनते ही पहरेदार का ग़ुस्सा पल भर में ग़ायब हो गया। उसने नौजवान को गले लगाया और शिकायत करने लगा।

“ऐ ख़ुशनसीब नौजवान, तुम आज तक कहाँ थे?”

“हम तीस साल से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं।”

नौजवान ने एक बार बाबा नासेह से यही बातें सुनी थीं। अब पहरेदार से दोबारा ये जुमला सुनकर वो उलझन में पड़ गया कि इसका आख़िर क्या मतलब हो सकता है। ये लोग मुझे कैसे जानते हैं? ये तीस साल से मेरा इंतज़ार क्यों कर रहे हैं?

ये सोचते हुए वो पहरेदार से दूर हटा और दरवाज़े से दाख़िल हो गया। अंदर का माहौल बहुत सुहाना और ख़ूबसूरत था। दीवारों पर तरह-तरह की तस्वीरें थीं। जानवरों की रंगीन तस्वीरें और संग-ए-मरमर के चमकते हुए सुतून इतने रोशन थे कि उसकी आँखें चकाचौंध हो गईं।

ठीक आगे दीवार पर उसने आबनूस का बना एक और ख़ूबसूरत दरवाज़ा देखा। वहाँ भी एक हबशी पहरेदार खड़ा था। वहाँ भी वही हुआ जो पहले दरवाज़े पर हुआ था और वो उस कमरे में भी दाख़िल हो गया।

इस तरह सात दरवाज़ों से गुज़रते हुए और पहरेदारों के सवालात के जवाब देते हुए, वो सबसे आख़िरी दरवाज़े पर पहुँचा। जैसे ही उसने उसे खोला, एक बड़ा सहन नज़र आया। सहन के बीचों-बीच एक हौज़ था।

ये हौज़ क्या था? ये एक मुकम्मल जादुई तालाब था। इसका पानी दूध की तरह सफ़ेद था। फिर भी पेंदे की चीज़ें साफ़ दिखाई दे रही थीं। हर मिनट, एक हसीन दोशीज़ा, जो आधी मछली और आधी इंसान थी, बाहर निकलती, आसमान की तरफ़ देखती और वापस पानी में ग़ायब हो जाती।

पानी बर्फ़ की तरह ठंडा था, फिर भी हौज़ से भाप उठ रही थी। कभी-कभी उसकी लहरों से आग के शोले भी भड़क उठते थे। इसके साथ ही, उसके अंदर बड़ी अज़दहा जैसी मछलियाँ भी तैरती हुई दिखाई देती थीं। उनकी आँखों की जगह दो लाल मोती चमक रहे थे, जिन्हें अगर अँधेरी रात में रखा जाए तो मीलों दूर से देखा जा सकता था।

नौजवान अब तक हिम्मत के साथ आगे बढ़ता आ रहा था। लेकिन इन तमाम हैरतअंगेज़ चीज़ों को देखकर उसके होश उड़ गए। वो इतना हैरान हुआ कि उसके होंठों से एक चीख़ निकल गई।

अचानक उसे बाबा नासेह की हिदायत याद आई कि कहीं भी किसी चीज़ से नहीं डरना है। उसने अभी अपनी हिम्मत जुटाई ही थी और आगे बढ़ा ही था कि उस दरवाज़े का पहरेदार उसकी तरफ़ बढ़ा।

बड़े अदब से झुकते हुए उसने नौजवान से कहा, “जनाब, मैं इस ख़ज़ाने का आख़िरी ख़ादिम हूँ।”

“मैं तीस साल से आपका इंतज़ार कर रहा हूँ।”

“अब जब आप आ गए हैं, तो मैं आपकी ख़िदमत पेश करता हूँ।”

“आगे दो कमरे हैं।”

“एक में हीरे और जवाहरात हैं, दूसरे में लाल और नीलम।”

“चमड़े के थैले दरवाज़े के पास ही रखे हैं।”

“आप जितने चाहें उतने थैले भर सकते हैं।”

यह कहकर पहरेदार ने कमरे का दरवाज़ा खोल दिया। नौजवान ने हीरे, जवाहरात, लाल और नीलम से अपने दिल की मुराद के मुताबिक़ कई थैले भर लिए और फिर उन्हें अपने कंधों पर उठाने की कोशिश की।

वो तमाम सात दरवाज़ों से गुज़रा और बाहर आया। साँस लेने के लिए उसने आख़िरी दरवाज़े पर थैले रख दिए। तभी पहले दरवाज़े का पहरेदार आगे बढ़ा और कहने लगा, “जनाब, बराए करम ख़ुद को तकलीफ़ न दें।”

“आप पानी के ऊपर चले जाएँ।”

“थैले वहाँ अपने आप पहुँच जाएँगे।”

नौजवान थैले छोड़कर पानी की सतह पर आ गया, जहाँ दोनों थैले पहले से ही उसका इंतज़ार कर रहे थे। बाबा नासेह एक तरफ़ खड़े मुस्कुरा रहे थे।

बाबा नासेह ने पूछा, “बेटा, क्या तुमने इस दौलत का टैक्स अदा किया, या बस इसे यूँ ही ले आए?”

नौजवान ने जवाब दिया, “बाबा, मुझसे किसी ने कोई टैक्स नहीं माँगा।”

बाबा ने कहा, “बहुत अच्छा, इन थैलों को यहीं छोड़ दो और फ़ौरन वापस वहीं जाओ जहाँ से तुम आए थे, ताकि टैक्स अदा कर सको। वरना ये तमाम दौलत तुमसे छीन ली जाएगी और तुम दोबारा कंगाल हो जाओगे।”

बाबा का हुक्म सुनकर नौजवान दोबारा हौज़ में कूद पड़ा और नीचे उतरता गया। जैसे ही हबशी पहरेदार ने उसे देखा, वो समझ गया कि नौजवान क्यों वापस आया है और उसने उसे महल में दाख़िल होने की इजाज़त दे दी।

नौजवान सातों दरवाज़ों से गुज़रकर आख़िरी सहन में पहुँचा। पहरेदार पहले से ही वहाँ खड़ा इंतज़ार कर रहा था। नौजवान को देखते ही वो उस पर झपटा, उसे पकड़ा, लिटाया और उस पर कोड़े बरसाने लगा। उसने पूरे ५० कोड़े मारे।

नौजवान दर्द से तड़प रहा था। जब कोड़े मारना बंद हुआ, तो वो उठा और कराहते हुए किसी तरह दूसरे दरवाज़े के फाटक तक पहुँचा। वो पहुँचा ही था कि दूसरे पहरेदार ने भी उसी तरह उसे और ५० कोड़े जमा दिए।

इस तरह उसे सातों दरवाज़ों में से हर एक पर ५० कोड़ों की सज़ा बर्दाश्त करनी पड़ी और ३५० कोड़े खाने के बाद उसके जिस्म की हर हड्डी दर्द कर रही थी।

वो कुछ देर आख़िरी दरवाज़े पर पड़ा रहा। जब उसका दर्द थोड़ा कम हुआ, तो उसने हौज़ से बाहर निकलने की हिम्मत जुटाई और जैसे ही वो ऊपर पहुँचा, वहीं गिर पड़ा।

बाबा ने उसे दिलासा दिया और कहा, “बेटा, मैं उस तकलीफ़ से अच्छी तरह वाक़िफ़ हूँ जो तुमने सही है।”

“सब्र करो, अब मत रोओ।”

“लो, मेरा रुमाल लो और अपनी आँखें पोछो।”

जैसे ही नौजवान ने बाबा का रुमाल अपनी आँखों पर फेरा, उसने ख़ुद को दोबारा तालाब के नीचे महल में पाया। वहाँ एक कमरे में सैकड़ों मर्द और बच्चे जमा थे, जश्न मना रहे थे, उछल-कूद रहे थे और हँसते हुए एक-दूसरे से बातें कर रहे थे।

नौजवान एक तरफ़ खड़ा रहा और किसी ने उस पर तवज्जो न दी। उसने सोचा, “ऐ मेरे ख़ुदा!”

“ये लोग कौन हैं, कहाँ से आए हैं और इतना जश्न क्यों मना रहे हैं?”

अब उसे कहाँ जाना चाहिए और क्या करना चाहिए? अचानक उसकी आँखें बंद हो गईं और जब वो ख़ुद-ब-ख़ुद खुलीं, तो उसने देखा कि सब अपने हाथ बाँधे ख़ामोश खड़े थे। वो अपने सामने वाले दरवाज़े को एकटक देख रहे थे।

अचानक, उसी सामने वाले दरवाज़े से एक बूढ़ी औरत कमरे में दाख़िल हुई। औरत का हुलिया कुछ ख़ौफ़नाक था। लेकिन उसके कपड़े और ज़ेवर बेहद क़ीमती थे। वो आहिस्ता से लोगों के पास से गुज़री और उस हॉलनुमा कमरे के बीचों-बीच एक कुर्सी पर बैठ गई।

उसके सर पर हीरे और जवाहरात से जड़ा एक क़ीमती ताज था। कुर्सी के दोनों तरफ़ बड़े-बड़े पर लगे हुए थे और हर तरफ़ हीरे और जवाहरात जगमगा रहे थे।

उसके बैठने के बाद, उसी दरवाज़े से सात हसीन नौजवान लड़के दाख़िल हुए और उसकी कुर्सी के पीछे अर्ध-दायरे में खड़े हो गए। ऐसा लग रहा था जैसे आसमान में गोल चाँद निकल आया हो और औरत बीच में बैठी हो।

कुछ ही देर बाद, बाबा नासेह भी आ पहुँचे और औरत के सामने खड़े होकर बोलने लगे, “आपकी आली जनाब, हाज़िरीन, अब जिन्नों के बादशाह की दौलत तक़सीम करने का वक़्त आ गया है।”

“आप सब अपना-अपना हिस्सा ले लें, क्योंकि बादशाह की शर्त पूरी हो गई है।”

यह कहते हुए बाबा ने नौजवान का चेहरा उठाया और लोगों की तरफ़ मोड़ दिया। अचानक नौजवान को लगा जैसे हर तरफ़ अंधेरा छा गया हो। कुछ नज़र नहीं आ रहा था।

नौजवान अपनी आँखें मलने लगा और आस-पास देखने लगा। फिर उसने ख़ुद को उसी तालाब के किनारे पाया। उसके दोनों थैले अभी भी वहीं पड़े थे।

नौजवान बाबा से कुछ पूछने ही वाला था कि बाबा बोल पड़े।

“मेरे अच्छे दोस्त, मैं आपके साथ बस कुछ देर और हूँ।”

“फिर मैं आपसे हमेशा के लिए जुदा हो जाऊँगा।”

“इसलिए, अब पूरी कहानी ग़ौर से सुनो।”

“वो बूढ़ी औरत जिसे आपने अभी देखा, वो मेरी बहन है।”

“उसकी शादी जिन्नों के बादशाह से हुई थी।”

“मेरी बहन से पहले बादशाह ने सात शादियाँ की थीं और हर बीवी बेहद ख़ूबसूरत थी।”

“लेकिन एक नुक़्स था: उनमें से हर एक बहुत मग़रूर और बद-मिज़ाज थी।”

“बादशाह उनके ग़ुरूर और बद-मिज़ाजी से बहुत परेशान रहता था।”

वो अक्सर कहा करता था कि मैं ज़ाहिरी ख़ूबसूरती से धोखा खा गया और दिल की बदसूरती को न देख सका। अगर किसी इंसान का दिल ख़ूबसूरत हो और उसका किरदार अच्छा हो, तो ज़ाहिरी बदसूरती कुछ भी नहीं है। अफ़सोस, मेरी ज़िंदगी अज़ाब बन गई है।

अब वो एक ऐसी औरत की तलाश में था जो दिखने में चाहे कितनी ही बदसूरत क्यों न हो, लेकिन नरम-दिल और शरीफ़ हो। कोई ऐसी जो लोगों से मोहब्बत करे, ताकि उसकी बाक़ी ज़िंदगी सुकून और आराम से गुज़र सके।

आख़िरकार, उसकी मुलाक़ात मेरी बहन से हुई। वो देखने में अच्छी नहीं थी, लेकिन बादशाह की तरह उसके सीने में भी एक नरम और पाक दिल था। वो बेहद शरीफ़ और बा-अदब औरत थी।

बादशाह ने उससे शादी कर ली और अपनी बाक़ी ज़िंदगी बहुत ख़ुशी से गुज़ारी। उनके सात बेटे हुए, जिन्हें आपने मेरी बहन के पीछे खड़े देखा था। उनमें से हर एक सूरज और चाँद की तरह रोशन था।

जब बादशाह की मौत का वक़्त क़रीब आया, तो उसने वसीयत की कि उसकी तमाम दौलत का एक हिस्सा उस नौजवान को दिया जाए जो किसी ख़ूबसूरत औरत की सही तारीफ़ कर सके। उससे पहले उसकी दौलत कभी तक़सीम न की जाए और न ही लड़कों को दी जाए।

उसके बाद उसने अपनी तमाम दौलत समंदर के नीचे महफ़ूज़ कर दी और जिन्नों की नस्ल के सात ताक़तवर हबशी नौजवानों को पहरेदार मुक़र्रर किया, ताकि लड़के ज़बरदस्ती दौलत तक़सीम न कर सकें।

मैंने बादशाह से वादा किया था कि मैं ऐसा नौजवान ज़रूर ढूँढूँगा। एक तरफ़ मेरी बहन और उसके बच्चों की मोहब्बत थी। दूसरी तरफ़ बादशाह से मेरा वादा था। इन दो बातों की वजह से मैं आज तक ऐसे नौजवान की तलाश कर रहा था।

और तीस साल के अरसे में मुझे कोई ऐसा इंसान नहीं मिला जो बादशाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ ख़ूबसूरत औरत की तारीफ़ कर सके।

और जब आपने कहा कि “मोहब्बत करने वाला बंदर उस हिरन से बेहतर है जो सिर्फ़ दिखावा करता है,” तो मैं समझ गया कि आपका क्या मतलब था, यानी हिरन ख़ूबसूरत होता है और दिखावा करके लोगों को लुभाता है। लेकिन वो दिल का बुरा होता है, जबकि बंदर बदसूरत होता है, लेकिन अपने मालिक से सच्चे दिल से मोहब्बत करता है। इसलिए बंदर हिरन से बेहतर है।

यानी ख़ूबसूरत औरत के मुक़ाबले मोहब्बत करने वाली औरत बेहतर है। यह वही तारीफ़ थी जो बादशाह चाहता था और मैं बेहद ख़ुश था कि तीस साल बाद ही सही, मैंने अपना वादा पूरा किया।

और मेरे दोस्त, इंसान उस दौलत की क़द्र करता है जो मेहनत और मशक़्क़त से कमाई गई हो, जबकि बिना मेहनत के मुफ़्त में मिली दौलत को उड़ा दिया जाता है।

इसी सोच के साथ आपको टैक्स के रूप में थोड़ी सी तकलीफ़ का सामना करना पड़ा। मुझे उम्मीद है कि आप अब इसे भूल जाएँगे, क्योंकि इसमें भी आपका ही फ़ायदा है।

लीजिए, अपनी कामयाबी पर मुबारकबाद क़बूल करें। अलविदा।

बूढ़े आदमी ने अभी अपनी कहानी ख़त्म ही की थी कि एक तेज़ तूफ़ान चलने लगा। हर तरफ़ घुप अंधेरा छा गया। बूढ़ा आदमी उस अंधेरे में ग़ायब हो गया, फिर कभी नज़र नहीं आया।

नौजवान वहीं हैरत-ज़दा और हक्का-बक्का खड़ा रह गया। और जब तूफ़ान ख़त्म हुआ, तो वो मैदान में खड़ा था। थैला उसके क़दमों के पास पड़ा था।

आख़िरकार, उसने थैले को अपने कंधे पर उठाया और अपने शहर की तरफ़ चल पड़ा। वो ख़ुशी-ख़ुशी घर जा रहा था और सोच रहा था कि बादशाह की नसीहत और बूढ़े आदमी से मुलाक़ात ज़्यादा क़ीमती थी या दौलत से भरा ये थैला।

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सबक

  • ज़ाहिरी ख़ूबसूरती से ज़्यादा दिल की ख़ूबसूरती और अच्छा किरदार अहम होता है।
  • सच्ची मोहब्बत और वफ़ादारी इंसान की असल ख़ूबसूरती है।
  • मेहनत और मशक़्क़त से हासिल की गई दौलत की इंसान ज़्यादा क़द्र करता है।
  • सही वक़्त पर सही नसीहत इंसान की ज़िंदगी बदल सकती है।

आख़िरी बात

प्यारे दोस्तों! आपको बाबा नासेह और तीन सवाल का ये हैरतअंगेज़ क़िस्सा कैसा लगा? क्या नौजवान का जवाब आपको भी सोचने पर मजबूर करता है? अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताइए। अगर आपको ये क़िस्सा पसंद आया हो, तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और ऐसी ही दिलचस्प कहानियों के लिए हमारे चैनल को लाइक और सब्सक्राइब करना न भूलें।

FAQs

सवाल: बाबा नासेह कौन थे?
जवाब: बाबा नासेह एक नेक, पारसा और रहम-दिल बुज़ुर्ग थे, जो शहर के दरवाज़े पर बैठकर आने वाले मुसाफ़िरों को नसीहत किया करते थे।

सवाल: बाबा नासेह हर आने वाले से कौन से तीन सवाल पूछते थे?
जवाब: वो पूछते थे कि सबसे बेहतरीन ख़ुराक कौन सी है, सबसे उम्दा लिबास कौन सा है और सबसे बेहतरीन औरत कौन सी है।

सवाल: नौजवान ने सबसे बेहतरीन ख़ुराक के बारे में क्या कहा?
जवाब: उसने कहा कि सबसे बेहतरीन ख़ुराक वो है जो भूख के वक़्त मयस्सर हो।

सवाल: नौजवान ने सबसे बेहतरीन औरत के बारे में क्या जवाब दिया?
जवाब: उसने कहा कि मोहब्बत करने वाला बंदर उस हिरन से बेहतर है जो सिर्फ़ दिखावा करता है। उसके जवाब का मतलब था कि ज़ाहिरी ख़ूबसूरती से ज़्यादा मोहब्बत और अच्छा किरदार अहम है।

सवाल: बाबा नासेह तीस साल से किसकी तलाश कर रहे थे?
जवाब: बाबा नासेह ऐसे नौजवान की तलाश कर रहे थे जो बादशाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ ख़ूबसूरत औरत की सही तारीफ़ कर सके।

सवाल: नौजवान को ख़ज़ाना कहाँ मिला?
जवाब: ख़ज़ाना एक जादुई तालाब के नीचे महफ़ूज़ किया गया था, जहाँ सात दरवाज़ों पर पहरेदार तैनात थे।

सवाल: नौजवान को सातों दरवाज़ों पर सज़ा क्यों मिली?
जवाब: नौजवान को दौलत लेकर वापस आने पर हर दरवाज़े पर ५० कोड़े लगाए गए। बाबा नासेह के मुताबिक़ इसका मक़सद उसे यह समझाना था कि मेहनत और मशक़्क़त से हासिल की गई दौलत की क़द्र होती है, जबकि बिना मेहनत मिली दौलत को इंसान आसानी से गँवा देता है।

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