जज़ीरे का ख़ज़ाना Urdu Hindi Kahaniyaan

तआरुफ

अस्सलामु अलैकुम प्यारे दोस्तों! समंदर की उतावली लहरों, गुमनाम जज़ीरों और उनमें छुपे रहस्यों की दुनिया हमेशा से ही इंसान को हैरत में डालती आई है। आज हम आपके लिए एक ऐसे ही बहादुर और ग़ैरतमंद मछेरे लड़के की दास्तान लेकर आए हैं, जिसकी ज़िंदगी में आए एक तूफ़ान ने उसकी तक़दीर बदल दी। आइए पढ़ते हैं “किस्सा जज़ीरे का ख़ज़ाना” और जानते हैं कि किस तरह एक छोटे से लड़के ने अपनी हिम्मत और समझदारी से अपनी बीमार माँ और गाँव वालों की ज़िंदगी बदल दी।

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किस्सा: जज़ीरे का ख़ज़ाना

नाम तो उसका दौलत आबाद था मगर था वो ग़रीबों का गाँव। दरअसल वो साहिल के किनारे आबाद मछेरों की एक छोटी सी बस्ती थी। वहाँ सिर्फ़ माहीगीर ही रहते थे। उनकी रोज़ी का ज़रिया सिर्फ़ समंदर ही था। समंदर में दूर-दूर तक जाकर वह मछलियाँ पकड़ते थे। कभी-कभी उन्हें हफ़्तों समंदर में बसर करने पड़ते थे। उसके बाद जब वह वापस आते तो उनकी कश्तियाँ मछलियों से भरी हुई होती थीं। उन मछलियों को बेचकर जो रुपया पैसा उन्हें मिलता उससे उनकी गुज़र औक़ात होती थी।

दौलत आबाद के मछेरों में हाल ही में एक नए मछेरे का इज़ाफ़ा हुआ था। यह गाँव के लिए तो नया ना था मगर मछलियाँ पकड़ने का काम उसने अभी शुरू किया था। उसका नाम क़ादर था। क़ादर अभी सिर्फ़ 12 बरस का ही था कि उसका बाप एक तूफ़ान में घिरकर समंदर में डूब गया। क़ादर का अब एक बूढ़ी माँ के सिवा और कोई ना था। इस मौक़े पर गाँव वालों ने उसका साथ दिया और वह उसे अपने साथ मछलियाँ पकड़ने के लिए ले जाने लगे।

समंदर क़ादर के लिए कोई नई चीज़ ना थी। वह पहले भी अपने बाप के साथ मछलियाँ पकड़ने जाता रहता था। इसलिए उसे इस काम को करने में दिक़्क़त नहीं हुई। क़ादर बहुत जल्द अपने काम में माहिर हो गया। समंदर में तैरने का उसे जुनून की हद तक शौक़ था। वह बिफरी हुई मौजों में ख़ूब मज़े से तैरता था। उसके बाप ने उसे सरकश समंदर में उतरने से मना कर दिया था। मगर अब उसे रोकने-टोकने वाला कोई ना था।

दिन इसी तरह गुज़र रहे थे। क़ादर दौलत आबाद के दूसरे मछेरों के साथ सूरज की पहली किरण नमूदार होते ही समंदर में निकल जाता और शाम को सूरज ग़ुरूब होने तक वापस आ जाता। इस दौरान उसने समंदर के बारे में और भी मालूमात हासिल कर ली थी।

वह क़रीब के सभी जज़ीरों तक हो आया था। दौलत आबाद से कश्ती के ज़रिए से डेढ़-दो दिन की मुसाफ़त पर बेशुमार जज़ीरे समंदर में बिखरे पड़े थे। यह सब जज़ीरे ग़ैर आबाद थे। इसकी वजह यह थी कि रात को समंदर उन जज़ीरों पर चढ़ दौड़ता था और सुबह पानी फिर उतर जाता था। बहरहाल यह जज़ीरे थे बहुत ख़ूबसूरत। उन पर तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। जगह-जगह गढ़ों में समंदर का पानी भर गया था। ऐसा लगता था जैसे छोटे-छोटे तालाब हों। उनमें तैरती रंग-बिरंगी छोटी-छोटी मछलियाँ क़ादर को बड़ी भली लगती थीं।

दिन तो किसी ना किसी तरह गुज़र ही रहे थे और दो वक़्त की रोटी भी मिल रही थी। मगर क़ादर हमेशा इस फ़िक्र में मुब्तला रहता था कि आख़िर कब तक वो सिर्फ़ पेट भरने की हद तक कमाता रहेगा। उसकी माँ बहुत बीमार थी। वो चारपाई पर पड़ी हर वक़्त ख़ांसती रहती थी।

क़ादर को मालूम था कि उसका इलाज सिर्फ़ शहर के बड़े हस्पताल में हो सकता है। मगर वहाँ तक वह बूढ़ी माँ को कैसे ले जाता और फिर हस्पताल का ख़र्च क़ादर किस तरह बर्दाश्त करता। वो हर वक़्त अल्लाह से दुआ करता कि उसे कहीं से ढेर सारी दौलत मिल जाए ताकि वो अपनी माँ का इलाज करा सके।

एक दिन क़ादर हस्बे मामूल अपनी कश्ती पर समंदर में निकला। कश्ती तो वही थी जो उसके बाप की थी। मगर क़ादर ने उसकी नए सिरे से मरम्मत करके उसको बिल्कुल नया कर दिया था। आज वह इस सफ़र में अकेला था क्योंकि उसका अज़ीज़ दोस्त फ़ज़ल बीमार था। दोपहर को वह बीच समंदर में था। दाईं तरफ़ ग़ैर आबाद जज़ीरों का सिलसिला था और बाईं तरफ़ समंदर। दूर तक सिर्फ़ पानी ही पानी नज़र आ रहा था।

दोपहर हो चुकी थी। क़ादर ने सोचा कि खाना खा लिया जाए। उसने पोटली खोली और उसमें से तली हुई मछली निकाली। उसकी माँ ने उसको चावल भी उबाल दिए थे। यह चावल और मछली उसकी मरगूब ग़िज़ा थी। उसने अभी मछली का पहला टुकड़ा ही मुँह में रखा था कि चौंक उठा। समंदर में एक बड़ा सा तख़्ता लहरों पर उछल रहा था। तख़्ते के साथ एक आदमी चिमटा हुआ था।

क़ादर ने फ़ौरन ही पानी में छलांग लगा दी। वो तेज़ी से तैरता हुआ उसकी तरफ़ बढ़ा और क़रीब पहुँचकर उसने तख़्ते से चिमटे हुए आदमी को पकड़ लिया। वो आदमी नीम बेहोश था। उसने आँखें खोलकर एक नज़र क़ादर को देखा और फिर बेहोश हो गया। क़ादर उसको पकड़ कर तख़्ते को तैराता हुआ अपनी कश्ती के क़रीब लाने की कोशिश करने लगा जो समंदर की तेज़ लहरों पर उससे दूर चली गई थी।

बड़ा अजीब मसला था। एक तरफ़ वह बेहोश आदमी था जिसको वह अगर एक लम्हे के लिए भी छोड़ देता तो वह डूब कर हलाक हो जाता। दूसरी तरफ़ उसकी कश्ती थी जो उससे आहिस्ता-आहिस्ता दूर होती चली जा रही थी। यह कश्ती उसका वाहिद असासा थी। उसकी रोज़ी का ज़रिया थी और सबसे बढ़कर यह कि उसके घर पहुँचने का वाहिद ज़रिया थी।

वह तो ग़नीमत था कि उस वक़्त समंदर में तुग़्यानी नहीं थी। वरना कश्ती लम्हा भर में कहीं से कहीं पहुँच जाती। क़ादर ने हिम्मत ना हारी और मुसलसल उस आदमी को तख़्ते समेत थामे कश्ती की तरफ़ बढ़ता रहा। इस कोशिश में उसके हाथ-पैर बुरी तरह शल हो गए थे। आख़िर सख़्त जद्दोजहद के बाद वह अपनी कश्ती को पकड़ने में कामयाब हो गया।

उसने बेहोश आदमी को कश्ती में उल्टा लिटाया और उसके मुँह से समंदर का ख़ारा पानी निकालने लगा। थोड़ी देर बाद उस शख़्स ने आँखें खोल दीं। वह एक अधेड़ उम्र का आदमी था और शक्ल से मल्लाह मालूम होता था। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी।

वो जब अच्छी तरह होश में आ गया तो उसने क़ादर को बताया कि उसका नाम शेरू है। फिर वह कहने लगा, “मैं बहरी कज़्ज़ाक़ बहराम का साथी हूँ। मैंने उसके साथ बेशुमार लोगों को लूटा है। पता नहीं कितने बदनसीबों के ख़ून से मैंने अपने हाथ रंगे हैं। दक्षिणी समंदर से गुज़रने वाला कोई जहाज़ बहराम के हाथ से नहीं बच सका। जब हमारे जहाज़ किसी शहर के साहिल पर पहुँचते तो वहाँ के लोग अपनी दुकानें छोड़कर अपने घरों में जा छुपते थे। हमें लूटने के लिए मैदान साफ़ मिलता था। सच यह है कि मेरी पूरी ज़िंदगी अल्लाह के बंदों को मारने और सताने में गुज़री है।”

शेरू आगे कहने लगा, “एक दिन बहराम को एहसास हुआ कि समंदर के सीने पर उसकी हुकूमत आख़िर कब तक चलेगी। एक ना एक दिन उसकी इजारादारी को ख़त्म होना ही है। क्योंकि उन दिनों यह ख़बर भी गर्म हो गई थी कि कोई नया बहरी कज़्ज़ाक़ भी मैदान में आ गया है। हुआ यूँ कि हम जब कभी किसी शहर का रुख़ करते तो मालूम होता कि वहाँ तो पहले ही सफ़ाई हो चुकी है। इस बात पर बहराम फ़िक्रमंद हो गया।

चुनांचे बहराम ने फ़ैसला किया कि वह अपनी तमाम दौलत एक संदूक में बंद करके किसी गुमनाम जज़ीरे पर दफ़न कर देगा और बुरे दिनों में उस दौलत को काम में लाएगा। उसने एक बड़ा संदूक तैयार करवाया और उसमें अपनी सारी दौलत भरकर एक गुमनाम जज़ीरे पर ले गया। इस सफ़र में उसके साथ एक तो मैं था, दूसरा करमू था और तीसरा गुड्डू।”

“जज़ीरे पर दौलत का संदूक दफ़न करने के बाद बहराम ने एक ऐसी हरकत की कि मैं हैरान रह गया। उसने अपना पिस्तौल निकालकर करमू और गुड्डू को गोली मार दी। जब मैंने वजह पूछी तो कहने लगा अब करमू और गुड्डू के भूत मेरे ख़ज़ाने की हिफ़ाज़त करेंगे। उनकी मौजूदगी में कोई भी इस ख़ज़ाने को यहाँ से नहीं निकाल सकेगा। मैं उसकी बात सुनकर काँप गया। मगर मैंने उसके सामने किसी परेशानी का इज़हार नहीं किया। वरना शायद वह मेरा भी वही हश्र करता जो वह अपने दूसरे साथियों का कर चुका था।”

“उसके बाद बहराम ने एक हिमाक़त और की। वो यह कि अपने जहाज़ पर वापस पहुँचकर यह ऐलान कर दिया कि उसने अपना तमाम ख़ज़ाना किसी नामालूम जज़ीरे पर दफ़न कर दिया है। जिसके बारे में मैं उसके और मेरे अलावा कोई नहीं जानता। उसने लोगों को यह भी बता दिया कि गुड्डू और करमू के भूत उस ख़ज़ाने की हिफ़ाज़त कर रहे हैं। इस बात से उसके साथियों में बेचैनी फैल गई।

कुछ अर्से बाद ही मौक़ा मिलते ही उन्होंने बहराम को जान से मार दिया। फिर वह मेरे पीछे पड़ गए कि मैं उस ख़ज़ाने का पता उन्हें बताऊँ। मेरे इंकार पर उन्होंने मुझे बहुत मारा-पीटा मगर जान से नहीं मारा क्योंकि मेरी मौत के बाद उन्हें ख़ज़ाने का पता कौन बताता।

उन्होंने मुझे कई रोज़ तक भूखा-प्यासा जहाज़ पर क़ैद रखा। आख़िर एक दिन मौक़ा पाकर मैं समंदर में कूद गया। समंदर में कूदने से पहले मैंने अर्शे पर से एक तख़्ता उठाकर समंदर में फेंक दिया था। उसी के सहारे मैं तैरता रहा। मैं दो दिन और दो रात तक इस तख़्ते के सहारे तैरता रहा हूँ। इस अर्से में मैंने ना कुछ खाया है और ना पिया है। मुझे शक है वो लोग मेरा पीछा करेंगे। मुझे कहीं छुपा दो जवान जल्दी करो वरना वो मुझे मार डालेंगे।”

इतना कहकर शेरू चुप हो गया। क़ादर ने सबसे पहले तो अपना खाना उसके आगे रखा। उसके बाद कश्ती खेनी शुरू कर दी। शेरू खाना खाता रहा और क़ादर कश्ती खेता रहा। पेट में कुछ पड़ा तो शेरू का रंग ही बदल गया। उसने क़ादर से पूछा, “कहाँ जा रहे हो?”

“अपने घर दौलत आबाद।” क़ादर ने जवाब दिया।

“दौलत आबाद मेरे ख़्याल में तुम्हारे घर जाना मुनासिब नहीं है। मेरी तलाश में वह लोग तुम्हारे गाँव तक आ सकते हैं।” शेरू ने कहा।

“तो फिर कहाँ जाऊँ? मेरा तो आसपास के गाँव में कोई दोस्त या रिश्तेदार भी नहीं है।” क़ादर ने बेचारगी से कहा।

“देखो क़ादर, मेरा किसी आबादी में जाना ठीक नहीं है।” शेरू ने उसे समझाते हुए कहा कि बेहतर यही होगा कि मैं किसी वीरान या सुनसान जगह पर छुप जाऊँ।

“वीरान जगह!” उसकी बात पर क़ादर उलझ गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस बदनसीब आदमी को कहाँ छुपाए। फिर वह सोच कर बोला, “चाचा, यहाँ बेशुमार ग़ैर आबाद जज़ीरे हैं। जहाँ रात को पानी आ जाता है। वैसे छुपने के लिए यह जगह बहुत अच्छी है।”

“पानी की तुम फ़िक्र मत करो। मैं किसी ऊँची जगह पर रात गुज़ार लूँगा। बस तुम मुझे वहीं ले चलो।” शेरू ने जल्दी से कहा।

चुनांचे क़ादर उसे एक ग़ैर आबाद जज़ीरे पर ले गया। वहाँ पहुँचकर उसने शेरू के साथ मिलकर एक ऊँची सी जगह पर घास-फूंस की एक झोपड़ी सी बनाई और फिर शेरू से वादा करके वापस आ गया कि वह उसके लिए सुबह खाना लेकर आएगा। उस वक़्त सूरज ग़ुरूब हो रहा था।

शाम को क़ादर जब घर पहुँचा तो वह ख़ाली हाथ था। उसकी माँ उसके लिए बहुत परेशान थी। एक तो वह अकेला समंदर पर गया था और फिर उसने देर भी बहुत लगा दी थी। माँ के बार-बार पूछने पर भी उसने देर से आने की वजह ना बताई और ख़ामोशी से जाकर लेट गया।

दूसरे दिन सुबह उसका दोस्त फ़ज़ल आया और झोपड़ी के बाहर से आवाज़ देकर बोला, “आ जा भाई क़ादर देर हो रही है।”

क़ादर जो उस वक़्त तक बिस्तर पर पड़ा हुआ था, बोला, “फ़ज़ल आज मैं मछलियाँ पकड़ने नहीं जाऊँगा। मेरी तबीयत अच्छी नहीं है।”

क़ादर की बात सुनकर उसकी माँ भी परेशान हो गई। उसे पता भी ना था और उसके बेटे की तबीयत ख़राब थी। मगर फ़ज़ल के जाने के थोड़ी ही देर बाद वो उठा और बोला, “माँ रोटी दे दे मैं जा रहा हूँ।”

उसकी बात पर माँ बड़ी हैरान हुई कि थोड़ी देर पहले तो इसकी तबीयत इतनी ख़राब थी कि उसने फ़ज़ल को वापस कर दिया और अब जाने को तैयार है। फिर जब उसने माँ से यह कहा कि खाना ज़रा ज़्यादा देना तो वह और भी हैरान हुई। ख़ैर उसने खाने की पोटली बांधी और क़ादर को देकर बोली, “बेटा जल्दी घर आ जाना और आज मछली ज़रूर लाना। अब घर में पकाने को कुछ भी नहीं है।”

क़ादर माँ की बात सुनकर चुपचाप झोपड़ी से बाहर चला गया। दोपहर को जब सूरज बिल्कुल सर पर था, वह शेरू के पास पहुँचा।

शेरू ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “आज तुझे देखकर ऐसा लगता है जैसे मेरा बेटा सामने खड़ा हो। अगर वह ज़िंदा होता तो आज तेरे जितना ही होता।”

“चाचा, तुम्हारा कोई लड़का भी था?” क़ादर ने हैरान होकर पूछा। “क्या बात है? तुम ख़ुश नहीं हो।” क़ादर ने आहिस्ता से कहा, “चाचा ऐसी दौलत लेकर मैं क्या करूँगा जो ग़रीबों और बेसहारा लोगों से छीनी गई हो।”

“यह दौलत ग़रीबों से ज़रूर छीनी गई है मगर अब फिर ज़ालिमों के हाथ लग जाएगी। उनके हाथों में जाने से बेहतर है कि यह फिर किसी ग़रीब को मिल जाए।”

क़ादर ने ख़ामोशी से सर झुका लिया। उसके बाद शेरू ने ज़बानी भी क़ादर को वो जगह बताई जहाँ ख़ज़ाना दफ़न था। क़ादर क्योंकि उस इलाके के चप्पे-चप्पे से वाक़िफ़ था। इसलिए वह अच्छी तरह समझ गया कि वह दौलत कहाँ दफ़न है। फिर भी उसने वह नक़्शा शेरू से ले लिया और वापस घर चल दिया।

रात को बिस्तर पर लेटे हुए क़ादर को नींद नहीं आ रही थी। उसकी आँखों के सामने रहकर ख़ज़ाना घूम जाता था जिसका पता सिर्फ़ उसको मालूम था। अगर वह ख़ज़ाना उसके हाथ लग जाए तो वह क्या करेगा? रात भर वह इसी सोच में गुम रहा। कभी-कभी उसे अपने आप पर ग़ुस्सा आने लगता कि उसने ख़ामख़ा इस चक्कर में पड़कर अपना चैन-ओ-आराम ख़त्म किया। उसकी नींद उससे कोसों दूर थी। रात को कई बार उसने चाहा कि वो ख़ज़ाने के नक़्शे को फाड़ कर फेंक दे। मगर वो कोशिश के बावजूद ऐसा ना कर सका।

सुबह के वक़्त क़ादर की आँख लगी और चंद लम्हों बाद वो फिर उठ बैठा। उसने जल्दी से माँ से खाना लिया और एक बार फिर शेरू की तरफ़ चल पड़ा।

क़ादर जज़ीरे के क़रीब पहुँचा तो उसने छलांग लगाई और जल्दी से कश्ती की रस्सी खींचकर चट्टान के उभरे हुए कोने से बांध दी। फिर वह लंबे-लंबे क़दम उठाता हुआ शेरू की झोपड़ी में पहुँचा। अंदर जाकर उसे चक्कर सा आ गया। शेरू ख़ून में लथपथ पड़ा था। वह मर चुका था।

“आख़िरकार दुश्मन काम कर ही गए।” क़ादर ने दुख के साथ कहा।

उसने एक गढ़ा खोदकर शेरू को दफ़न कर दिया और बोझल दिल के साथ वापस चल पड़ा। ख़ज़ाने ने एक और जान ले ली थी। पहले गुड्डू, करमू और फिर बहराम के बाद अब शेरू भी सिर्फ़ उस ख़ज़ाने की वजह से अपनी जान से हाथ धो बैठा था।

घर पहुँचने पर जो ख़बर उसकी माँ ने सुनाई वो उस पर बिजली बनकर गिरी।

“यहाँ एक आदमी तुम्हें पूछता आया था बेटे। यह शेरू कौन है? वो कह रहा था कि किसी शेरू ने तुम्हें कोई चीज़ दी है। वो आदमी वही चीज़ लेने आया था।”

“कैसा आदमी था माँ और क्या कह रहा था?” क़ादर ने जल्दी से माँ से पूछा।

“शक्ल से तो कोई लुटेरा मालूम हो रहा था मगर अपने आप को मछेरा कह रहा था। मगर वो कौन है, उसका तुझसे क्या ताल्लुक़ है और यह शेरू कौन है?” क़ादर की माँ भी अब कुछ परेशान हो गई थी।

उसने माँ को तसल्ली देते हुए कहा, “फ़िक्र ना करो माँ, कोई ऐसी बात नहीं है।”

आधी रात के वक़्त अचानक क़ादर की आँख खुल गई। कोई खुरदुरा सा हाथ उसके मुँह पर जमा हुआ था। क़ादर ने बड़ा ज़ोर मारा कि किसी तरह उसे हटा दे। उसका दम भी घुट रहा था। मगर काफ़ी जद्दोजहद के बावजूद वह उस हाथ को अपने मुँह पर से ना हटा सका।

फिर ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके गिरेबान में हाथ डाला और फिर उसके गिरेबान में रखा हुआ ख़ज़ाने का नक़्शा निकल गया। इसके साथ ही उसके मुँह पर से हाथ हट गया। उसने जल्दी से उठकर देखा। दो साए अंधेरे में भागे चले जा रहे थे। क़ादर ने चाहा कि उनका पीछा करे मगर फिर कुछ सोचकर ख़ामोश हो गया।

रात फिर वह बड़ी उलझन में रहा। सुबह उठकर वह ख़ामोशी से टहलता हुआ समंदर के किनारे गया। समंदर में उस वक़्त तुग़्यानी थी। लहरें बिफ़र-बिफ़र कर साहिल पर चढ़ रही थीं। हर तरफ़ दूधिया सफ़ेद झाग उड़ रहा था।

क़ादर ख़ामोशी से खड़ा समंदर को देख रहा था। फिर उसने सोचा कि वो इस तरह वक़्त ज़ाया कर रहा है। इस तरह तो उन लोगों को ख़ज़ाने तक पहुँचने का मौक़ा मिल जाएगा। उसने कुछ और सोचा और फिर कश्ती की रस्सी खोलकर उसमें सवार हो गया। उसने चप्पू थामे और समंदर की तरफ़ कश्ती को खेने लगा। उस वक़्त अगर उसे कोई देखता तो यही कहता कि दीवाना है। मगर क़ादर को किसी की कोई परवाह ना थी। वो पहले ख़ज़ाने तक पहुँचना चाहता था।

दूसरी तरफ़ लुटेरों का सरदार जोशु अपने साथियों से कह रहा था, “इस ख़राब मौसम में समंदर में सफ़र करने का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता। सब्र से काम लो। वक़्त का इंतज़ार करो। मौसम ठीक होते ही हम चल देंगे।”

मौसम की ख़राबी की वजह से क़ादर को बड़ी परेशानी हो रही थी। उसकी रफ़्तार बहुत सुस्त थी। मगर उसने हिम्मत ना हारी और मुसलसल आगे बढ़ता रहा। एक घंटे बाद ही हवा अचानक रुक गई और समंदर में उठता ज्वार-भाटा ख़त्म हो गया। समंदर के पुरसुकून होते ही क़ादर ने अपनी कश्ती को तेज़ी से खेना शुरू कर दिया। मौसम की बदलती सूरत ने उसमें जोश भर दिया था। वह समझ गया था कि अल्लाह ने उसकी मदद की है। वह बार-बार मुड़कर पीछे देखता मगर समंदर में दूर-दूर तक किसी और कश्ती का निशान ना था।

ख़ज़ाने का नक़्शा तो उसके पास नहीं था मगर शेरू ने कई बार उसको ज़बानी समझाया था और फिर उसने नक़्शे को इस क़दर ग़ौर से देखा था कि सब उसको ज़बानी याद हो गया था। दोपहर के बाद वह उस जज़ीरे तक पहुँच गया जो शेरू के कहने के मुताबिक़ ख़ज़ाने वाला जज़ीरा था।

क़ादर ने कश्ती को किनारे पर लगाया और फिर उसमें से बेलचा और कुदाल उठाकर जज़ीरे पर चढ़ गया। उसने अंदाज़े से उस छोटी सी चट्टान को तलाश करना शुरू कर दिया जिसके पहलू में बहराम ने ख़ज़ाना दफ़न किया था। डेढ़ घंटे की मेहनत के बाद वह चट्टान मिल गई। अब मसला यह था कि खुदाई किस जगह की जाए। यह चट्टान तो काफी बड़े घेरे में थी। क़ादर किस-किस जगह को खोदता।

काफ़ी देर सोचने के बाद उसने एक जगह खुदाई करने का फ़ैसला किया ही था कि चप्पुओं की तेज़ आवाज़ ने उसे चौंका दिया। उसके दुश्मन तादाद में पाँच थे। उनका लीडर सर पर लाल पट्टी बांधे हुए था। वो जोशु था जो अपने साथियों की हिम्मत बंधा रहा था और कह रहा था, “शाबाश मेरे साथियों बस थोड़ी मेहनत और।”

फिर जैसे ही उसकी निगाह बेतरतीब कटाव वाले जज़ीरे पर पड़ी, वह चीख उठा, “वो रहा जज़ीरा, ख़ज़ाने वाला जज़ीरा! अब हम मालदार बन जाएंगे।”

“मगर उस ख़ज़ाने की निगरानी तो भूत कर रहे हैं।” उसके एक साथी ने डरते हुए कहा।

“बेवकूफ़ जाहिल! ख़बरदार जो अब ऐसी बातें मुँह से निकालीं। भूत कोई चीज़ नहीं। इंसान मर जाता है तो दुनिया से उसका ताल्लुक़ ख़त्म हो जाता है। यह भूत की कहानी महज़ बकवास है। गुड्डू और करमू मर चुके हैं। मुर्दे ज़िंदा नहीं होते।”

फिर जोशु की हिदायत पर वह लोग अपनी कश्ती को जज़ीरे के किनारे लगाकर जज़ीरे पर चढ़ आए। क़ादर अभी तक ख़ामोशी से सब कुछ देख रहा था। जब उसने उन्हें जज़ीरे पर चढ़ते देखा तो घनी झाड़ियों की आड़ में छुप गया।

थोड़ी देर तक घूमने के बाद जोशु ने बिलआख़िर वो चट्टान तलाश कर ही ली और फिर अपने साथियों को वहाँ खुदाई करने का हुक्म दिया। चारों आदमी बेलचे और फावड़े लेकर जुट गए। एक घंटे की खुदाई के बाद भी कुछ ना मिला तो वह काफी मायूस हुए।

जोशु ने उनसे कहा, “बस हिम्मत हार बैठे? अगर ख़ज़ाना एक जगह नहीं है तो दूसरी जगह होगा, वहाँ खोदो।”

“मगर यहाँ कुछ नहीं है! तुम ख़ामख़ा हमें परेशान कर रहे हो।” एक आदमी ने झुंझलाकर कहा।

“बेवकूफ़ों! दौलत तुम्हारे क़दमों में है, तुमसे सिर्फ़ चंद गज़ दूर। ज़रा सी मेहनत और ज़िंदगी भर का ऐश, हिम्मत करो आओ मेरे साथ।” यह कहकर जोशु ने कुदाल उठाई और दूसरी जगह से ज़मीन खोदनी शुरू कर दी। उसकी देखा-देखी उसके दूसरे साथी भी उसके साथ शामिल हो गए।

इस बार वो अपने मक़सद में कामयाब हो गए। दो फ़ीट तक खोदने के बाद जब एक आदमी की कुदाल किसी चीज़ से टकराई तो वह ख़ुशी से चीख पड़ा, “मिल गया ख़ज़ाना, मिल गया!”

फिर सब ने मिलकर उस भारी संदूक को बाहर निकाला जिसमें बहराम ने अपनी दौलत छुपाई थी। क़ादर ख़ामोश छुपा हुआ सब कुछ देख रहा था।

संदूक का ढक्कन उठते ही सबकी आँखें खुली की खुली रह गईं। संदूक सोने-चांदी के सिक्कों, बर्तनों और हीरे-जवाहरात और मोतियों के क़ीमती हारों से भरा हुआ था। जोशु तो जोश में सोने-चांदी के सिक्कों को अपने सर पर से उछाल रहा था। कोई हीरे-जवाहरात का हार पहने नाच रहा था तो कोई सोने-चांदी के बर्तनों को मुँह से लगा रहा था। ग़रज़ दौलत की झलक ने उनको पागल कर दिया था। उन्हें अपना होश ना था। क़ादर बड़े अफ़सोस से उन दौलत के पुजारियों को देख रहा था जो उस दौलत को देखकर अपने आप में नहीं रहे थे।

अचानक उनके एक साथी ने घबराकर कहा, “अंधेरा हो गया, अब गुड्डू और करमू के भूत आने वाले होंगे। मग़रिब के वक़्त ही तो भूत बाहर आते हैं।”

उसकी यह बात सुनकर सबके चेहरे फ़क़ हो गए। जोशु ने कहा, “मैंने तुम सबको पहले भी समझाया है कि भूत-भूत कुछ नहीं होता। यह सब वहम है। आने दो गुड्डू और करमू के भूत को, मैं उनसे भी निपट लूँगा।”

कहने को उसने कह दिया मगर उस वक़्त फैलते हुए अंधेरे ने उसको भी डरा दिया था। फिर जोशु ने अपने साथियों से कहा, “दोस्तों, इस वक़्त अंधेरा फैल चुका है। ऐसे में ख़ज़ाने के संदूक के साथ सफ़र करना कुछ मुनासिब नहीं है। हम इस ऊंचे टीले पर रात बसर करेंगे और सुबह यहाँ से चल देंगे क्योंकि समंदर में ज्वार-भाटा आना शुरू हो गया है।”

उसके साथियों के पास उसकी बात मानने के अलावा और कोई रास्ता ना था। वह सब ख़ामोशी से संदूक को लेकर टीले पर चढ़ गए। उन्होंने चारों तरफ़ सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करके आग जला दी और लेट-बैठकर रात गुज़ारने लगे। जोशु ने हिदायत की कि दो आदमी पहरा देंगे, बाक़ी सोएंगे। फिर दूसरे उठ जाएंगे, इस तरह रात गुज़र जाएगी। चुनांचे ऐसा ही किया गया।

आधी रात का वक़्त था। आग ठंडी पड़ चुकी थी। जोशु और उसके साथी गहरी नींद में थे। इसके अलावा पहरा देने वाले भी झूम रहे थे कि अचानक समंदर की तरफ़ से एक शोर सुनाई दिया। यह आवाज़ सुनकर सभी उछल पड़े और आँखें फाड़-फाड़ कर समंदर की तरफ़ देखने लगे। वहाँ सफ़ेद लिबास में एक आदमी खड़ा हुआ था जिसका चेहरा भी सफ़ेद चादर से छुपा हुआ था। वो समंदर के पानी पर खड़ा हुआ था और बड़ी ख़ौफ़नाक आवाज़ें निकाल रहा था। “यह तो करमू का भूत है!” एक आदमी के मुँह से यह निकलना था कि वह सब भूत-भूत कहते हुए इधर-उधर भाग खड़े हुए।

भूत पहले तो वहीं खड़ा हुआ आवाज़ें निकालता रहा, फिर लंबे-लंबे क़दम उठाता हुआ उधर आया जहाँ वह सब सो रहे थे। उसने संदूक का ढक्कन खोला और उसमें से हीरे-जवाहरात के हार निकालकर अपने लिबास में रखने लगा। उसने ज़्यादा कुछ नहीं लिया, सिर्फ़ चंद हार निकालकर अपनी जेब में रखे और फिर सोने-चांदी के सिक्के भी एक थैले में भरे और वापस चल पड़ा। चाँद निकल आया था।

समंदर की लहरें एकदम तूफ़ानी हो गई थीं। वह भूत क़ादर था जिसने उन लोगों को डराकर भगा दिया था और अब वापस अपनी कश्ती की तरफ़ जा रहा था। उसी वक़्त उसने देखा कि तूफ़ानी लहरें संदूक को बहाकर समंदर में ले गईं और अब वहाँ कुछ ना था। जोशु और उसके साथी भूत से इस क़दर डर गए थे कि फिर टीले पर आए ही नहीं और यूँ भूत अपना काम करके चलता बना।

क़ादर ने इस दौलत से सबसे पहले अपनी माँ का इलाज कराया। फिर दौलत आबाद में एक हस्पताल बनवाया ताकि ग़रीब मछेरों को भी इलाज-मुआलेजे की सहूलियतें हासिल हो जाएं।

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सबक

  • सब्र और हिम्मत: इंसान कितनी ही मुश्किल परिस्थिति में क्यों न हो, हिम्मत और समझदारी से हर मुसीबत का सामना किया जा सकता है।
  • हराम की दौलत का अंजाम: लोलुपता और बेईमानी से कमाई गई दौलत कभी फलती-फूलती नहीं और अंत में तबाही का कारण बनती है।
  • सच्ची इंसानियत: दौलत का सही इस्तेमाल वही है जो ग़रीबों, बेसहारा लोगों और बीमारों के काम आ सके।
  • अंधविश्वास पर अक़्ल की जीत: डर और वहम इंसान को कमज़ोर बनाते हैं, जबकि समझदारी और निडरता से बड़े से बड़े दुश्मन को मात दी जा सकती है।

आख़िरी बात

दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि मुश्किल हालात में भी ईमानदारी और हिम्मत का रास्ता कभी नहीं छोड़ना चाहिए। क़ादर की इस बहादुरी और माँ के प्रति उसकी भक्ति ने आपको कैसा प्रभावित किया, हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं! अगर आपको यह किस्सा पसंद आया हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें, लाइक करें और ऐसी ही और दिलचस्प कहानियों के लिए हमारे ब्लॉग को फ़ॉलो और सब्सक्राइब करना न भूलें। शुक्रिया!

FAQs

  • सवाल 1: ‘जज़ीरे का ख़ज़ाना’ कहानी का मुख्य पात्र कौन है?
  • जवाब: इस कहानी का मुख्य पात्र क़ादर नाम का 12 साल का एक निडर और समझदार मछेरा लड़का है, जो अपने गाँव दौलत आबाद में अपनी बीमार माँ के साथ रहता है।
  • सवाल 2: बहराम डाकू ने अपना ख़ज़ाना जज़ीरे पर क्यों छुपाया था?
  • जवाब: बहराम को लगा कि समंदर पर उसकी हुकूमत और एकाधिकार हमेशा नहीं रहेगा और नए कज़्ज़ाक़ों के आने से उसकी दौलत छिन सकती है, इसलिए उसने अपनी सारी दौलत एक संदूक में बंद करके एक गुमनाम जज़ीरे पर गाड़ दी थी।
  • सवाल 3: क़ादर ने डाकुओं को भगाने के लिए क्या तरकीब अपनाई?
  • जवाब: क़ादर ने सफ़ेद लिबास पहनकर और चेहरा ढककर खुद को करमू का भूत बनाया और ख़ौफ़नाक आवाज़ें निकालकर डाकुओं के सरदार जोशु और उसके साथियों को डराकर भगा दिया।
  • सवाल 4: क़ादर ने ख़ज़ाने से मिले पैसों का क्या किया?
  • जवाब: क़ादर ने ख़ज़ाने से सबसे पहले अपनी बीमार माँ का इलाज कराया और फिर अपने गाँव दौलत आबाद में एक हस्पताल बनवाया ताकि ग़रीब मछेरों को इलाज की सहूलियत मिल सके।

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