तआरुफ
अस्सलामु अलैकुम प्यारे दोस्तों! आज हम आपके लिए एक ऐसा दिलचस्प किस्सा लेकर आए हैं जो आपको हंसाएगा भी और सोचने पर भी मजबूर करेगा। दुनिया में चालाक लोगों की कोई कमी नहीं, लेकिन कहते हैं कि सेर को सवा सेर ज़रूर मिलता है। यह किस्सा एक ऐसे ही कंजूस और मक्कार ताजिर की कहानी है जिसे आख़िरकार अपनी ही चाल का मज़ा चखना पड़ा।
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सेर को सवा सेर | मज़ाहिया और सबक़ आमोज़ कहानी
एक गांव में मुफ़्त मल नामी ताजिर रहता था। वह एक ट्रांसपोर्ट कंपनी का मालिक था, लेकिन था बहुत कंजूस। ख़ुद को होशियार और चालाक समझता था, लेकिन उसकी होशियारी और चालाकी दूसरों से मुफ़्त काम लेने में सर्फ़ होती थी। इसीलिए लोग उसे मुफ़्त मल कहते थे।
ट्रांसपोर्ट कंपनी होने की वजह से उसे हमेशा नौकरों की ज़रूरत रहती थी। ग़रज़मंद लोगों को अच्छी तनख़्वाह का सब्ज़ बाग़ दिखाकर अपनी कंपनी में नौकर रख लेता था। तुम ही बताओ, छोटे छोटे काम करने के लिए वह दो सौ रुपये माहाना तनख़्वाह दे तो भला कौन ऐसा है जो उसकी नौकरी को क़बूल नहीं करेगा।
कई लोग अपनी मुस्तक़िल मुलाज़िमत छोड़कर उसकी नौकरी को क़बूल करते थे। लेकिन मुफ़्त मल ने नौकरों के लिए एक शर्त रखी थी। शर्त यह थी कि जो चीज़ भी लाने के लिए कहा जाए, नौकर को चाहिए कि वह चीज़ बाज़ार से फ़ौरन ख़रीदकर लाए।
यह बहाना करने की ज़रूरत नहीं कि बाज़ार में नहीं मिली या ख़त्म हो गई। जो चीज़ तलब की जाए, फ़ौरन हाज़िर करनी चाहिए। अगर न लाई गई तो फिर तनख़्वाह भी नहीं मिलेगी और नौकरी से भी हाथ धोना पड़ेगा।
हर कोई इस शर्त को मामूली समझकर ख़ुशी ख़ुशी मुलाज़िमत क़बूल कर लेता था।
मुफ़्त मल नौकर से उनतीस दिन तक ख़ूब काम लेता और तीसवें दिन नौकर को हांक मारकर कहता, “यह पाँच रुपये लो और बाज़ार से थोड़ी हाय हाय ख़रीद लाओ।”
बेचारा नौकर शश-ओ-पंज में पड़ जाता कि यह हाय हाय क्या चीज़ है। आज तक उसने इस चीज़ का नाम न सुना था। फिर वह सोचता, इस नाम की कोई चीज़ बाज़ार में होगी, तभी तो उन्होंने तलब की है।
नौकर बाज़ार जाता और नामुराद वापस आ जाता। फिर उस बेचारे को तयशुदा शर्त के मुताबिक़ तनख़्वाह भी न मिलती और नौकरी से भी हाथ धोना पड़ता।
इस तरह जो भी नौकर आता, उससे मुफ़्त मल उनतीस दिन तक ख़ूब काम लेता और फिर तीसवें रोज़ हाय हाय लाने भेज देता। अब तक मुफ़्त मल दस बारह नौकरों से इसी तरह मुफ़्त काम ले चुका था। वह अपनी चालाकी पर बहुत ख़ुश था।
लेकिन सब दिन एक जैसे नहीं होते। दुनिया में सेर को सवा सेर कभी न कभी ज़रूर मिल जाता है।
एक दिन ऐसा ही हुआ। एक लड़का जो बहुत ग़रीब था, मुफ़्त मल का इश्तहार पढ़कर नौकरी के लिए ट्रांसपोर्ट कंपनी में पहुंचा। मुफ़्त मल ने उसे भी वही शर्त बताई। बेचारे ग़रीब लड़के ने इस शर्त को बग़ैर सोचे समझे क़बूल कर लिया।
वह निहायत ईमानदारी से कंपनी में काम करने लगा। काम करते करते उनतीस दिन गुज़र गए।
ग़रीब लड़का ख़ुश था कि अब तनख़्वाह के लिए सिर्फ़ एक दिन रह गया है। अगर कल का दिन भी उसने काम कर लिया तो फिर उसे दो सौ रुपये मिल जाएंगे। उसने कभी इतने सारे रुपये नहीं देखे थे।
वह सोचने लगा, “इस तनख़्वाह में से माँ को सौ रुपये भेज दूंगा। पचास रुपये के अपने लिए कपड़े बना लूंगा और बाक़ी पैसे अपने ख़र्च के लिए रख लूंगा।” इस तरह सोचते सोचते उसकी आंख लग गई।
दूसरे रोज़ वह ख़ुशी ख़ुशी काम पर गया। थोड़ी देर छोटे मोटे काम करने के बाद मुफ़्त मल ने उसे आवाज़ दी। जब वह आया तो मुफ़्त मल ने उसके हाथ में पाँच का नोट देकर कहा, “जल्दी जा और बाज़ार से हाय हाय ले आ।”
लड़का चंद लम्हे सोचता रहा कि यह हाय हाय क्या बला है। जब उसकी समझ में कुछ न आया तो अपने दिल को यह कहकर समझा लिया कि इस नाम की कोई चीज़ बाज़ार में ज़रूर होगी, लेकिन वह उसे न जानता हो।
फिर वह बाज़ार गया। हर दुकानदार से उसने हाय हाय मांगी, लेकिन उसे कहीं न मिली। बेचारा ग़रीब लड़का मायूस हो गया।
गांव में सिर्फ़ एक ही दुकान बाक़ी रह गई थी। उसने सोचा, शायद वहां मिल जाए। उम्मीद भरे लहजे में उसने दुकानदार से पूछा, “सेठ साहब, क्या आपके यहां हाय हाय मिलेगी?”
हाय हाय का नाम सुनते ही दुकानदार ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा। लड़का समझ न सका कि दुकानदार क्यों हंस रहा है। उसने पूछा, “सेठ जी, आप क्यों हंस रहे हैं?”
“इसलिए हंसी आ रही है कि तुम भी उस मुफ़्त मल के धोखे में आ गए। तुम्हें मुफ़्त मल ही ने भेजा है ना?”
“जी हाँ।” लड़के ने जवाब दिया।
दुकानदार ने अपनी हंसी पर क़ाबू पाते हुए कहा, “मुफ़्त मल की यह हमेशा की आदत है कि वह नौकरों से मुफ़्त काम लेता है और जब वह हाय हाय नहीं लाते तो उन्हें तनख़्वाह भी नहीं देता। इतना ही नहीं, उन्हें मुलाज़िमत से भी बर्ख़ास्त कर देता है। अब तुम ही कहो कि हाय हाय नाम की कोई चीज़ भी दुनिया में है।”
दुकानदार के यह अल्फ़ाज़ सुनकर लड़के ने हैरत का भी इज़हार किया और परेशानी का भी। उसे अपने ख़्वाब चकनाचूर होते नज़र आए। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस परेशानी से बचने के लिए क्या रास्ता निकाला जाए।
वह मायूस होकर एक बाग़ के कोने में बैठ गया और सोचने लगा। लेकिन यह मुअम्मा हल होते दिखाई न दिया।
अचानक उसकी नज़र दरख़्त के पास एक बिच्छू पर पड़ी। उसी वक़्त उसके ज़हन में एक तरकीब आई।
वह फ़ौरन बाज़ार गया और एक दुकान से ख़ाली बोतल ख़रीद लाया। बोतल का रंग ऐसा था कि अंदर की चीज़ साफ़ दिखाई न दे सकती थी। उसने बड़ी ख़ूबी से उस बिच्छू को पकड़ा और उसे बोतल में बंद करके ढक्कन मज़बूती से लगा दिया।
यह बोतल लेकर वह मुफ़्त मल के पास गया। उसे देखते ही मुफ़्त मल ने हंसते हुए पूछा, “क्या हाय हाय मिल गई?”
“कैसे न मिलती सेठ साहब? सारा गांव छान मारा। आख़िर एक दुकान पर बड़ी मुश्किल से मिली है।” लड़के ने निहायत संजीदगी से जवाब दिया।
“कहाँ है? कहाँ है?” मुफ़्त मल ने हैरत से पूछा। उसके चेहरे की सारी हंसी अचानक ग़ायब हो गई थी।
“इस बोतल में बंद है जनाब। बड़ी नाज़ुक और क़ीमती चीज़ है। आहिस्ता से बोतल में हाथ डालकर निकाल लीजिए।”
मुफ़्त मल ने लड़के के हाथ से बोतल ली और आहिस्ता से उसका ढक्कन खोला। ज्यों ही उसने बोतल में हाथ डाला, बिच्छू ने कसकर डंक मारा और मुफ़्त मल वाक़ई हाय हाय करने लगा।
उस वक़्त मुफ़्त मल की हाय हाय देखने लायक़ थी। दुकान में इधर उधर नाच रहा था और ज़बान से हाय हाय करता जाता था।
लड़के ने मुस्कुराते हुए कहा, “सेठ साहब, अब तो हाय हाय मिल गई ना? कैसी लाजवाब है यह चीज़। अच्छा, अब मैं जाता हूँ। लेकिन इतना याद रखना कि आइंदा किसी नौकर को हाय हाय लाने के लिए मत भेजना। वरना तुम्हें इसी तरह हाय हाय करते रहना पड़ेगा।”
उसके बाद वह मुफ़्त मल को उसी हालत में छोड़कर वहाँ से चला गया।
सबक:
- चालाकी का अंजाम बुरा होता है- जो शख़्स दूसरों को धोखा देकर फ़ायदा उठाता है, एक न एक दिन उसे उसी का मज़ा चखना पड़ता है।
- ग़रीबी अक़्ल की दुश्मन नहीं- ग़रीब लड़के के पास दौलत न थी, लेकिन उसकी समझ और हिम्मत ने उसे कामयाब किया।
- सब्र और सोच से हर मुश्किल हल होती है- मायूसी के वक़्त भी लड़के ने हिम्मत न हारी और सोचकर रास्ता निकाल लिया।
- ज़ुल्म करने वाले को ज़ुल्म का बदला मिलता है- मुफ़्त मल ने जो दूसरों के साथ किया, आख़िरकार वही उसके अपने साथ हुआ।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
सवाल 1: मुफ़्त मल कौन था?
जवाब: मुफ़्त मल एक कंजूस ताजिर था जो ट्रांसपोर्ट कंपनी का मालिक था और नौकरों से मुफ़्त काम लेने के लिए मशहूर था।
सवाल 2: मुफ़्त मल की चाल क्या थी?
जवाब: वह नौकरों को 29 दिन काम कराता और 30वें दिन “हाय हाय” नाम की फ़र्ज़ी चीज़ बाज़ार से लाने भेज देता। न मिलने पर तनख़्वाह और नौकरी दोनों छीन लेता था।
सवाल 3: लड़के ने मुफ़्त मल को कैसे सबक़ सिखाया?
जवाब: उसने एक बिच्छू बोतल में बंद करके मुफ़्त मल को “हाय हाय” के नाम पर दे दिया। बिच्छू के डंक से मुफ़्त मल सच में हाय हाय करने लगा।
सवाल 4: इस कहानी से हमें क्या सीखना चाहिए?
जवाब: यह कहानी सिखाती है कि दूसरों को धोखा देना और उनका हक़ मारना कभी फ़ायदेमंद नहीं होता। अक़्ल और ईमानदारी से हर मुश्किल का हल निकाला जा सकता है।
आख़िरी बात:
दोस्तों, यह किस्सा सेर को सवा सेर हमें यह याद दिलाता है कि दुनिया में कोई भी हमेशा के लिए चालाक नहीं रह सकता। जो दूसरों के हक़ मारता है, वक़्त उसे ज़रूर सबक़ सिखाता है।
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