क़िस्सा: लंगड़ा देव

तआरुफ

अस्सलामु अलैकुम प्यारे दोस्तों! आज हम आपके लिए एक बेहद दिलचस्प और सबक़-आमोज़ क़िस्सा लेकर हाज़िर हुए हैं, जिसका उनवान है लंगड़ा देव। इस हैरानकुन दास्तान में आप देखेंगे कि किस तरह अक़्लमंदी, हिम्मत और एक-दूसरे का साथ देकर बड़ी से बड़ी मुसीबत और जालिमों की चालों को नाकाम बनाया जा सकता है। चलिए, इस पुर-इसरार सफ़र का आग़ाज़ करते हैं और देखते हैं कि दोस्तों की यह जोड़ी अपने हक़ में क्या फ़ैसला करती है।

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क़िस्सा: लंगड़ा देव

किसी शहर में दो दोस्त रहते थे। उनमें एक मोची था, दूसरा दर्जी। शाम को अपनी-अपनी दुकान बढ़ाकर इकट्ठे मिल बैठते और एक-दूसरे को अपना दुख-दर्द सुनाकर दिल हल्का कर लेते।

एक रोज़ बादशाह ने दर्जी को महल में तलब किया और कहने लगा, “मलका-ए-आलिया परसों एक शादी में शरीक हो रही हैं और तुम्हें उनके लिए पोशाक सीनी है। और देखो कपड़ा बहुत क़ीमती है, इसकी एक कतरन भी ज़ाया न होने पाए।”

बेचारे दर्जी की क्या मजाल थी कि वह बादशाह के सामने दम मार सकता! उसने कपड़ा उठाया, बादशाह को झुककर सलाम किया और दुकान में आ बैठा।

दर्जी के जाने के बाद बादशाह ने मोची को तलब किया और उससे कहने लगा, “यह लो चमड़ा, इसके मलका-ए-आलिया के लिए जूते बनाओ। यह मगरमच्छ का चमड़ा है, बड़ी तलाश के बाद मिला है। जो बचे वह हमें वापस कर देना। और हाँ, जूते दो दिन के अंदर-अंदर तैयार हो जाएँ, परसों मलका-ए-आलिया को एक शादी में जाना है।”

मोची ने झुककर सलाम किया और चमड़ा लेकर सीधा दर्जी की दुकान पर आ गया। दर्जी किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था, उसे अपने दोस्त के आने की ख़बर तक न हुई।

मोची ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला, “क्यों दोस्त, यह बहरे कब से हो गए हो कि किसी के आने की आहट भी नहीं सुनते? यह कपड़े का थान कहाँ से चुरा लाए हो? कपड़ा तो बड़ा शानदार है।”

दर्जी ने चौंक कर कहा, “अरे यार, क्या पूछते हो? यह कपड़ा बादशाह ने दिया है। कहता है कि मलका की पोशाक दो दिन में तैयार हो जाए। वह जिस ढंग की पोशाक तैयार करवाना चाहता है, वह दो दिन में क्या सात दिन में भी तैयार नहीं हो सकती। बस इसी सोच में डूबा हुआ हूँ, करूँ तो क्या करूँ?”

“और मुझे हुक्म हुआ है कि दो दिन में मलका का जूता तैयार कर दूँ,” मोची बोला, “ज़रा चमड़ा तो देखो, न जाने किस कमबख़्त बुड्ढे मगरमच्छ का है! बहुत मोटा, सख़्त और खुरदुरा। मैं कहता हूँ अगर यह पूरा महीना भी पानी में डूबा रहे तो नरम होने का नाम न ले। इसे छिलना और साफ़ करना तो रहा अलग। अब मैं भी वही बात कहूँगा जो तुम कह रहे हो कि करूँ तो क्या करूँ?”

दर्जी थोड़ी देर सोचता रहा, फिर बोला, “मेरी मानो तो यहाँ से भाग चलो। इसके सिवा और कोई सूरत नज़र नहीं आती। परसों बादशाह के आदमी आएँगे तो अपना सा मुँह लेकर चले जाएँगे। बादशाह झिल्लाएगा तो बड़ा, पर अपनी बला से, हम यहाँ होंगे ही नहीं। वह हमारा बिगाड़ेगा क्या?”

“अरे वाह! क्या बात है तुम्हारी। तुम्हारे हाथ तो दर्जियों के हैं मगर दिमाग़ वकीलों का है। वाह-वाह, क्या सूझी है तुम्हें! अब देर काहे की है, चलो भाग चलें।”

“अभी नहीं, रात के अँधेरे में चलेंगे। इस वक़्त निकले तो कोई देख लेगा और सिपाहियों को बता देगा कि इस तरफ़ गए हैं।”

“ठीक है, ठीक है,” मोची कहने लगा, “रात ही को चलेंगे।”

जब रात का अँधेरा छा गया तो दोनों छुपते-छुपाते घरों से निकले और शहर के बाहर एक सराय में ठहर गए। यहाँ रात गए तक इक्का-दुक्का मुसाफ़िर का आना-जाना रहता था। उन्होंने पहले डटकर खाना खाया और फिर चंद रोटियाँ लेकर पोटली में बाँध लीं। उसके बाद एक कोने में पड़कर सो गए।

सुबह को पो फटते ही दोनों आगे चल पड़े। अभी थोड़ी दूर चले होंगे कि सामने जंगल नज़र आया। दर्जी मोची से कहने लगा, “इस वक़्त जंगल के अंदर जाना तो ख़तरनाक होगा। वह देखो दाईं तरफ़ एक पतली सी पगडंडी है, उसी पर हो लेते हैं। कम से कम दरिंदों से तो बचे रहेंगे।”

वह पगडंडी पर चले जा रहे थे कि पगडंडी एक क़िले के दरवाज़े पर जाकर ख़त्म हो गई। दरवाज़े में एक बहुत बड़ा देव कूल्हों पर हाथ रखे खड़ा था। मोची तो डर के मारे काँपने लगा, मगर दर्जी ने अपने औसान क़ायम रखे। वह मोची को दिलासा देकर दो क़दम आगे बढ़ा और देव से कहने लगा, “हुज़ूर सलाम! यह हमारी ख़ुशक़िस्मती होगी जो आप हमें आज की रात अपने क़िले में बसर करने की इजाज़त दे दें।”

देव ने जो उसे इतना निडर देखा तो ज़रा ठिटका और फिर बोला, “लेकिन तुम काम क्या करते हो?”

“हुज़ूर मैं दर्जी हूँ और हुज़ूर मैं मोची हूँ।”

“अच्छा तो चले आओ अंदर,” देव ने कहा और उन्हें अपने सोने के कमरे में ले गया।

“सुनो मियाँ दर्जी,” देव बोला, “यह रहा कपड़ा, इसका कुर्ता सी दो।”

“किसका कुर्ता हुज़ूर?” दर्जी ने पूछा।

“मेरा और किसका?” देव ने ग़ुस्से से कहा।

दर्जी दिल ही दिल में कहने लगा: ‘जल तू जलाल तू, आई बला टाल तू। पहाड़ का ग़िलाफ़ न सिया, इसका कुर्ता सी दिया।’

फिर उसने देव से पूछा, “हुज़ूर, नाप लेने के लिए कोई फीता होगा आपके पास?”

“फीता कोई नहीं है यहाँ,” देव बोला, “बताओ कितनी देर में सी दोगे?”

दर्जी कहने लगा, “हुज़ूर, हाथ से सीना होगा, मशीन तो है नहीं मेरे पास। कम से कम ६ महीने लगेंगे कुर्ता तैयार होने में। अगर मोची भी हाथ बटाए तो मुझे ज़रा आसानी रहेगी।”

“ठीक है। देखो मैं ६ महीने के लिए बाहर जा रहा हूँ। वापस आऊँ तो कुर्ता तैयार हो। वह सामने बावर्चीख़ाना है, जो चीज़ चाहो मज़े से पकाओ और खाओ। और हाँ, ख़बरदार इस क़िले के आख़िरी कमरे में मत जाना। मुझे पता चल गया कि तुम वहाँ गए हो तो दोनों की गर्दन उड़ा दूँगा।”

यह कहकर देव खर्राटे लेने लगा और वह दोनों भी बेफ़िक्र होकर सो गए।

दूसरे रोज़ देव तो अपने सफ़र पर रवाना हो गया और दर्जी अपने काम में जुट गया। वह सीने-पिरोने में तो ताक़ था ही, खाने पकाने में भी बड़ा माहिर था। उसने बावर्चीख़ाने में जाकर अंडे-परांठे, दलिया और क़हवा तैयार किया और फिर दोनों दोस्त मज़े से नाश्ता करने लगे।

अचानक एक आवाज़ आई, “अरे तौबा! दुनिया भी कितनी ख़ुदग़र्ज़ है। आप ही हप-हप खा रहे हैं, हमें पूछा तक नहीं।”

दर्जी ने इधर-उधर देखा तो एक कोने में मैना का पिंजरा टंगा नज़र आया। वह कहने लगा, “ऐ बी मैना, तुम तो कोने में टंगी हो, नज़र आतीं तो तुम्हें भी पूछ लेते।”

यह कहकर उसने परांठे की चूरी बनाई और मैना की प्याली में रख दी। मैना ने सैर होकर खाया और फिर बोली, “मेरी बड़ी बहन आख़िरी कमरे में बैठी चरख़ा काट रही है। बेचारी के मुँह में एक हफ़्ते से ख़ील तक उड़कर नहीं गई।”

“मैं अभी उसके पास नाश्ता लेकर जाता हूँ,” दर्जी ने कहा और नाश्ता लेकर क़िले के आख़िरी कमरे में पहुँच गया। वहाँ सचमुच एक ख़ूबसूरत सी लड़की बैठी चरख़ा काट रही थी।

लड़की खाना खा चुकी तो दर्जी ने उससे पूछा, “देव ने तुम्हें यहाँ क्यों क़ैद कर रखा है और वह मैना कौन है?”

लड़की बोली, “वह मेरी छोटी बहन है। बहुत नटखट और लड़ाका है, इसलिए देव ने उसे मैना बनाकर पिंजरे में बंद कर दिया और मुझे यहाँ क़ैद कर दिया।”

“लेकिन तुम हो कौन?” दर्जी ने पूछा।

“हम इस मुल्क की शहज़ादियाँ हैं,” लड़की ने जवाब दिया, “यह ज़ालिम देव हमें महल से उड़ा लाया है। कहता है, मैं अपने बेटों के साथ तुम्हारा ब्याह करूँगा। एक रोज़ तरंग में आकर कहने लगा: ‘मेरी प्यारी नन्हीं शहज़ादी, वह जो बड़ा सा संदूक़ है न, उसके अंदर एक छोटी सी डिबिया है। उस डिबिया में एक छोटा सा ज़हरीला नाग है। बस उसी नाग में मेरी जान है। अगर कोई उसे मार डालेगा तो मैं मर जाऊँगा। अगर तुम किसी को उस संदूक़ के क़रीब जाता देखो तो फ़ौरन चीख़-पुकार मचा देना। तुम्हारा शोर-गुल सुनकर मैं फ़ौरन यहाँ पहुँच जाऊँगा।'”

दर्जी ने कहा, “आप फ़िक्र मत करो शहज़ादी साहिबा! अल्लाह ने चाहा तो मैं कल ही उसका सफ़ाया कर दूँगा।”

दूसरे रोज़ दर्जी बाहर जाकर एक भारी पत्थर ले आया। फिर आहिस्ता से संदूक़ का ढक्कन उठाया और डिबिया खोली। नाग तड़प कर उछला और दर्जी को डसने को ही था कि उसने फ़ुर्ती से उस पर रुमाल फेंका और उसे बाँधकर मज़बूत गिरह दे दी। फिर उस पर ज़ोर से पत्थर दे मारा। नाग वहीं ठंडा हो गया। नाग के मरने की देर थी कि सारा जादू टूट गया। मैना शहज़ादी बन गई। दोनों बहनें गले मिलीं और उन्होंने दर्जी का शुक्रिया अदा किया।

बड़ी शहज़ादी कहने लगी, “तुम दोनों हमारे साथ महल में चलो। बादशाह सलामत तुम्हें इतना इनाम देंगे कि सारी उम्र ऐश करोगे।”

“अल्लाह ताला आपको ख़ुश रखे,” दर्जी ने कहा, “हमारे लिए यही इनाम बहुत है कि आप इस ज़ालिम देव की क़ैद से आज़ाद हो गईं।”

वह चारों क़िले से बाहर निकले। दर्जी और मोची ने शहज़ादियों को शहर जाने वाली पगडंडी पर डाल दिया और ख़ुद दूसरी तरफ़ चले गए।

चलते-चलते दोपहर सर पर आ पहुंची। रास्ते में एक जंगल पड़ा। दोनों एक दरख़्त के साए तले लेट कर सुस्ताने लगे। थके हुए थे, लेटते ही नींद आ गई। आँख खुली तो पेट में चूहे दौड़ रहे थे। पोटली में से रोटियाँ निकालीं और अचार के साथ खाकर फिर चल खड़े हुए।

चलते-चलते मोची बोला, “मैं जानूँ, हमारी मौत हमें घेर कर यहाँ ले आई है। तक़दीर ने हमें एक सुनहरी मौक़ा दिया था और तुमने उसे गवाँ दिया।”

“मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझा,” दर्जी ने कहा।

मोची बोला, “बादशाह हमें इनाम देता तो हम मज़े से चैन की बंसरी बजाते और इन दर-बदर की ठोकरों से निजात मिल जाती।”

दर्जी ने कहा, “मुझे तुम्हारी इस बात से बहुत दुख हुआ है। तुमने वह मिस्ल नहीं सुनी कि नेकी कर दरिया में डाल। नेकी करके भूल जाओ, यह उम्मीद मत रखो कि जिस शख्स के साथ तुमने नेकी की है, वह तुम्हें उसका बदला देगा।”

वह बातें करते चले जा रहे थे कि दूर से एक शख्स आता दिखाई दिया। वह ख़ुश हुए कि शायद उससे कुछ रास्ते का अता-पता मिल जाए। वह शख्स उनके पास आया और ख़ैर-ख़ैरियत के बाद बोला, “अल्लाह ताला का शुक्र है कि इस बीयाबान में किसी इंसान की सूरत देखने को मिली। मैं सिपाही हूँ। छुट्टी ख़त्म करके वापस नौकरी पर जा रहा था कि इस वीराने में फँस गया। हज़ार जतन करने पर भी बाहर जाने का रास्ता नहीं मिल रहा।”

“अरे मियाँ,” दर्जी बोला, “हम भी उसी कश्ती के सवार हैं जो तुम्हें ले डूबी है। सुबह से दोपहर होने को आई रास्ता तलाश करते-करते, मगर रास्ता कहीं हो तो मिले।”

“इलाही ख़ैर!” सिपाही बोला, “एक मुसीबत से तो मर-मर के हुआ था जीना, पड़ गई और यह कैसी मेरे अल्लाह! नहीं।”

“कौन सी मुसीबत का ज़िक्र कर रहे हो मियाँ? ज़रा हम भी तो सुनें,” दर्जी ने कहा।

सिपाही बोला, “मैं अपनी धुन में मस्त चला जा रहा था कि रास्ते में एक लोमड़ी मिल गई। कहने लगी:

“मामू जान! इस चिलचिलाती धूप में सफ़र करने से बीमार हो जाओगे, आओ मेरे भट में दो घड़ी आराम कर लो, दिन ढले चले जाना।”

मुझे लोमड़ी की यह बात पसंद आई, मैं उसके पीछे हो लिया।

वह मुझे एक भट के क़रीब ले जाकर बोली:

“तुम अंदर जाओ मामू जान, मैं आपके लिए ठंडे पानी का इंतज़ाम करती हूँ, बस अभी आई कि आई।”

मैं बेवकूफ़ उसके बहकाए में आ गया। अंदर जो दाख़िल हुआ तो दो अंगारे से दहकते नज़र आए। अब मालूम हुआ कि यह तो शेर का भट है। फ़ौरन ही बुज़ुर्गों का क़ौल याद आ गया कि मुसीबत में औसान ख़ता न होने दो।

मैंने हौसले से काम लिया। आगे बढ़कर शेर को अदब से सलाम किया और कहा:

“शेर बादशाह! आपने मुझे याद किया था? फ़रमाइए मैं आपकी क्या ख़िदमत कर सकता हूँ?”

शेर करहाता हुआ बोला:

“मैं बीमार हूँ बच्चा! मैंने लोमड़ी से कहा था कि कोई छोटा-मोटा शिकार ला दो कि पेट के दोज़ख़ की आग को ठंडा करूँ।”

“शेर बादशाह!” मैंने कहा, “तुम मुझे शौक़ से खा लो, मगर पहले मुझे यह देखने दो कि तुम्हें कहीं बुख़ार तो नहीं है।”

यह कहकर मैंने शेर के बदन पर हाथ रखा तो वह बुख़ार से फूँक रहा था। मैंने कहा:

“शेर बादशाह! तुम्हें तो सख़्त बुख़ार है और बुख़ार में गोश्त नहीं खाना चाहिए। आपके लिए दूध मुफ़िद रहेगा, कहो तो ले आऊँ?”

“बेटा! तुम आदमी हम जानवरों से ज़्यादा सयाने होते हो,” शेर ने कहा, “जिस तरह बन पड़े मुझे दूध ला दो।”

मैं बराबर वाले गाँव में जाकर दूध ले आया। शेर दूध पी चुका तो ऊँगने लगा। मैं वहाँ से दबे पाँव बाहर निकल आया और बगटुट भागता हुआ यहाँ पहुँच गया।”*

यह तीनों बैठे बातें कर रहे थे कि अचानक एक लंगड़ा देव आ धमका। कहने लगा, “बड़ी राज़ की बातें हो रही हैं, मेरा आना बुरा तो नहीं होगा?”

अरे मियाँ! दर्जी बोला, “कहाँ का राज़ और कैसी राज़ की बात है! हम तो इस बात पर हैरान हो रहे हैं कि इस जंगल-बीयाबान से कैसे निकलें? तुम यहीं के बाशिंदे मालूम होते हो, कोई रास्ता बाहर जाने का हो तो बताओ।”

“अच्छा, तो यूँ कहो कि तुम रास्ता भूल गए हो। अरे भाई! भटके हुए को रास्ता दिखाना तो मेरा फ़र्ज़ है, लेकिन एक शर्त है।”

“क्या?” दर्जी ने पूछा।

“शर्त यह है कि मैं तुम्हें एक साल तक ख़ूब खिलाऊँगा-पिलाऊँगा और जब तुम मुफ़्त की खाकर मोटे-ताज़े हो जाओगे तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा।”

“अरे मियाँ लंगड़-दीन! मुझे तो तुम अक़्ल के दुश्मन दिखाई देते हो। हम बात कर रहे हैं रास्ते की और तुम्हें सूझ रही है पेट की। कहो, है इन दोनों में कोई मेल? और यह जो तुम हमें खाने की कह रहे हो, तो हमने हाथ दिखाया तो तुम दूसरी टाँग से भी हाथ धो बैठोगे।”

लंगड़ा देव दर्जी की बातें सुनकर घबरा गया। कहने लगा, “अच्छा मियाँ! अगर यह शर्त मंज़ूर नहीं तो कोई और शर्त पेश करूँ?”

“ज़रूर,” दर्जी ने कहा, “हम कोई बुज़दिल नहीं हैं जो तुम्हारी शर्तों से डर जाएँ।”

देव दर्जी की दिलेरी पर बड़ा हैरान था। बोला, “शर्त यह है कि तुम सराय में रहो और साल भर मज़े से दावतें उड़ाओ। साल के बाद तुम तीनों को मेरा एक-एक काम करना होगा। जिसने वह काम कर दिया उसे रास्ता दिखा दूँगा और जिसने नहीं किया उसे वहीं हड़प कर जाऊँगा।”

दर्जी कहने लगा, “हमें तुम्हारी शर्त मंज़ूर है।”

लंगड़ा देव उन तीनों को एक सराय में ले गया। सराय देखकर मोची दर्जी के कान में कहने लगा, “यह सराय कहाँ से आ टपकी? हम सारे जंगल में घूम चुके हैं, हमें तो यह कहीं नज़र न आई थी।”

“अरे भाई!” दर्जी ने कहा, “कहीं से आ टपकी हो, तुम्हें आम खाने हैं या पेड़ गिनने हैं?”

लंगड़ा देव सरायदार से कहने लगा, “देखो मियाँ! यह तीनों मेरे मेहमान हैं, साल भर आपके यहाँ ठहरेंगे। साल के बाद यह दुब्बे की तरह मोटे-ताज़े हो गए तो तुम्हें मुँह-माँगा इनाम दूँगा। यह लो इनके एक साल का ख़र्च।” यह कहकर लंगड़े देव ने अशर्फियों की थैली सरायदार के हाथ पर रख दी और खुद यह जा, वह जा!

लंगड़ा देव चला गया तो दर्जी, मोची और सिपाही सोचने लगे कि अब क्या करें? सिपाही और मोची के मुँह लटके हुए थे, मगर दर्जी हश्शाश-बश्शाश था। आख़िर मोची से रहा न गया, वह दर्जी से कहने लगा, “क्यों जी! तुमसे किसने कहा था कि उस लंगड़े की शर्त मंज़ूर कर लो? अब अल्लाह जाने हम उसके काम कर भी सकेंगे कि नहीं?”

दर्जी ने जवाब दिया, “मेरे भाई! जिस अल्लाह ने हमें इतनी मुसीबतों से निकाला है, वह इस मुसीबत से भी हमें ज़रूर निजात दिलाएगा, फ़िक्र मत करो।”

दर्जी ने आदत बना ली थी कि जब ज़रा फ़ुरसत मिलती, जंगल में घूमने चला जाता। एक रोज़ वह एक बहुत ऊँचे दरख़्त को देखकर कहने लगा, “कमाल है भाई! इतना ऊँचा दरख़्त मैंने पहले कभी नहीं देखा। अगर इस पर चढ़कर चोटी पर पहुँच जाऊँ तो आस-पास का सारा इलाक़ा देख सकूँगा।”

दर्जी दरख़्त पर चढ़कर इधर-उधर नज़र दौड़ा रहा था कि अचानक नीचे पत्तों की खड़खड़ाहट सुनाई दी। झुककर देखा तो सिट्टी-गुम हो गई! दरख़्त के नीचे दो देव दस्तरख़्वान पर तरह-तरह के खाने चुन रहे थे। इतने में तीसरा देव भी आ गया और तीनों ने खाना शुरू कर दिया। तीसरे देव को दर्जी ने फ़ौरन पहचान लिया और उसके मुँह से आप ही आप निकल गया, “अरे! यह तो वही अपना लंगड़-दीन है।”

एक देव चटकारे लेकर बोला, “भाई! गोश्त तो बड़ा मज़ेदार है, वाह-वाह!”

लंगड़ा बोला, “जो गोश्त मैं तुम्हें एक साल बाद खिलाऊँगा, उसे खाकर दुनिया-जहान के गोश्त भूल जाओगे। तीन दुब्बे पाल रहा हूँ, तीन-तीन दुब्बे!”

एक देव बोला, “भाई! ज़रा खुलकर बात करो, यह दुब्बे तुम्हें कहाँ से मिले?”

लंगड़े देव ने कहा, “मैंने जादू के ज़ोर से जंगल के रास्ते गुम कर दिए हैं। वह भटकते फिर रहे थे कि मेरे हत्ते चढ़ गए। एक सिपाही है, दूसरा दर्जी और तीसरा मोची। उन्हें मैं सराय में छोड़ आया हूँ कि खा-पीकर ख़ूब मोटे हो जाएँ। एक साल बाद मैं उन तीनों को एक-एक काम करने को कहूँगा। अगर उन्होंने वह काम कर दिए तो रास्ता दिखा दूँगा, वरना… मैं समझ गया।”

पहला देव होंठों पर ज़बान फेरकर बोला, “लेकिन भाई! वह काम क्या है? ज़रा हमें भी तो बताओ।”

लंगड़ा बोला, “सुनो! दर्जी को दूँगा चमड़े का एक टुकड़ा जो दिखाई देगा कपड़े का टुकड़ा, उससे कहूँगा कि इसका कुर्ता सी दो। वह कुर्ता सी नहीं सकेगा और हार जाएगा। मोची को दूँगा कपड़े का एक टुकड़ा जो दिखाई देगा चमड़े का टुकड़ा, उससे कहूँगा कि इसका जूता तैयार कर दो। वह जूता तैयार ना कर सकेगा और हार जाएगा। सिपाही से कहूँगा कि घोड़े पर सवार हो जा, वह होगा बारहसिंगा और दिखाई देगा घोड़ा। वह भी हार जाएगा। यूँ उन तीनों को अपना माल समझो।”

देव चले गए तो दर्जी दरख़्त से उतरा और सराय में जाकर लंगड़े देव की बातें अपने साथियों को बता दीं।

जब साल ख़त्म हुआ तो लंगड़े देव ने दर्जी को कुर्ता सीने के लिए कपड़ा दिया। दर्जी बोला, “मियाँ! कपड़ा दो कपड़ा, चमड़े के भी कहीं कुर्ते सिले हैं?”

देव ने जूता बनाने के लिए मोची को चमड़ा दिया तो वह बोला, “अरे भाई! चमड़ा दो चमड़ा, यह तो कपड़ा है।”

देव ने सिपाही को घोड़े पर सवार होने के लिए कहा तो वह बोला, “अरे! बारहसिंगे को घोड़ा बना दिया तुमने? भाई कमाल है!”

लंगड़े देव ने सर पीट लिया और उनको रास्ता बताकर ऐसा भागा कि पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। वह तीनों हँसी-ख़ुशी अपने-अपने घरों को रवाना हो गए।

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सबक़

  • अक़्लमंदी और हुशियारी: किसी भी बड़ी से बड़ी मुसीबत या चालाक दुश्मन का मुक़ाबला ताक़त के बजाए अक़्लमंदी और ज़हानत से किया जा सकता है।
  • सच्ची दोस्ती और इत्तिहाद: मुश्किल वक़्त में एक-दूसरे का साथ देने और हौसला बढ़ाने से कठिन से कठिन रास्ते भी आसान हो जाते हैं।
  • हिम्मत और सब्र: ख़ौफ़ज़दा होने के बजाए अपने औसान क़ायम रखने से हर उलझन का हल निकल आता है।
  • नेकी का जज़्बा: बे-ग़रज़ होकर दूसरों की मदद करना इंसान को हर आफ़त और ज़वाल से महफ़ूज़ रखता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

  • सवाल 1: ‘लंगड़ा देव’ की कहानी से हमें क्या सबक़ मिलता है?
  • जवाब: इस कहानी से हमें यह सबक़ मिलता है कि मुश्किल से मुश्किल तरीन हालात में भी ख़ौफ़ज़दा होने के बजाए अक़्ल, हिम्मत और इत्तिहाद से काम लिया जाए तो हर मुसीबत पर क़ाबू पाया जा सकता है।
  • सवाल 2: दर्जी ने लंगड़े देव की चाल को कैसे नाकाम बनाया?
  • जवाब: दर्जी ने दरख़्त पर छुपकर लंगड़े देव और उसके साथियों की तमाम बातें चुपके से सुन ली थीं, जिससे उसे देव के मकर और चालबाज़ी का पहले ही इल्म हो गया और उसने अपने साथियों को होशियार कर दिया।
  • सवाल 3: क्या तीनों दोस्त देव की क़ैद से आज़ाद होने में कामयाब रहे?
  • जवाब: जी हाँ, दर्जी की ज़हानत और ऐन वक़्त पर सही फ़ैसले की बदौलत तीनों दोस्तों ने देव की हर शर्त का पर्दाफ़ाश कर दिया और बा-इज़्ज़त आज़ाद होकर अपने घरों को लौट गए।

आख़िरी बात

प्यारे दोस्तों! उम्मीद है कि लंगड़ा देव की यह दिलचस्प और सबक़-आमोज़ दास्तान आपको बेहद पसंद आई होगी। अगर आपको दर्जी की अक़्लमंदी और दोस्तों की यह कहानी अच्छी लगी हो, तो इसे अपने अज़ीज़ों और दोस्तों के साथ ज़रूर शेयर करें। नीचे कमेंट करके अपनी राय का इज़हार ज़रूर कीजिएगा और ऐसी ही मजीद पुर-कशिश और ख़ूबसूरत कहानियों के लिए हमारे ब्लॉग को फॉलो करना न भूलें।

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