तआरुफ़
अस्सलामु अलैकुम प्यारे दोस्तों! आज हम एक ऐसे होशियार और हाज़िरजवाब शख़्स की कहानी लेकर आए हैं, जो हर मुसीबत में अपनी अक़्ल से ऐसा रास्ता निकालता था कि बड़े-बड़े लोग हैरान रह जाते थे। “हुक्म का गुलाम” एक मज़ेदार और सबक़-आमोज़ दास्तान है, जो हमें अक़्ल, सूझ-बूझ और लफ़्ज़ों की ताक़त का एहसास कराती है। आइए, इस दिलचस्प किस्से को पढ़ते हैं।
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किस्सा: हुक्म का गुलाम
बहुत दिन पहले की बात है। मुल्क इथियोपिया में एक होशियार और चालाक शख़्स रहता था। नाम उसका आबू था। वो जितना चालाक था उतना ही मसख़रा भी था। इसलिए सब उसे चाहते थे।
आबू का दुनिया में कोई न था। वो इथियोपिया में रहते-रहते उकता गया था। एक दिन वो अपने पास की थोड़ी नक़दी और कुछ सामान लेकर वहाँ से रवाना हो गया। इधर-उधर घूमते-फिरते एक दिन राजधानी पहुँच गया।
यहाँ पहुँचकर उसे मुलाज़िमत की फ़िक्र हुई। सीधा बादशाह के दरबार में गया और गुज़ारिश की, “बादशाह सलामत, मुझे कोई नौकरी दे दें। आप जो भी काम देंगे निहायत ईमानदारी से अंजाम दूंगा और आपका फ़रमाँबरदार बनकर रहूँगा।”
बादशाह ने उसकी दरख़्वास्त क़ुबूल कर ली और उसे पहरा देने के काम पर लगा दिया। वो बहुत जल्द अपनी हाज़िरजवाबी और ख़ुशमिज़ाजी की वजह से मक़बूल हो गया। बादशाह भी ख़ुश हुआ और उसे ख़ास तौर पर अपने महल का पहरेदार बना दिया। इस ओहदे पर तरक़्क़ी पाकर आबू की शान बढ़ी और वो महल में इतराता और रौब जमाता फिरने लगा।
एक दिन बादशाह ने उसे राज़दाराना अंदाज़ में कहा, “आबू, आज मैं एक ज़रूरी काम से बाहर जा रहा हूँ। इस राज़ की किसी को ख़बर न होने पाए। ख़याल रहे कि मेरी वापसी तक किसी को महल में न जाने दिया जाए।”
“हुज़ूर, आप मुतमइन रहें। मैं महल के दरवाज़े की दिन-रात निगरानी करूँगा और किसी को आपके जाने की ख़बर न बताऊँगा।” बादशाह को इत्मीनान हुआ और वो वहाँ से चला गया। आबू दिन-रात दरवाज़े की सख़्त निगरानी करने लगा।
उस रात पूरा चाँद आसमान पर चमक रहा था। हर तरफ़ चाँदनी बिखरी हुई थी। पूरे चाँद के जश्न की रात थी। लोग नाच-गा रहे थे और ख़ुशियाँ मना रहे थे। आबू का दिल भी नाचने और गाने के लिए मचलने लगा। लेकिन वो दरवाज़े के पास से हट नहीं सकता था और बादशाह के हुक्म को तोड़ नहीं सकता था।
उसे एक तरकीब सुझाई दी। उसने दरवाज़े की तमाम कीलें और कलाबे निकाल लिए और अपने हथियारों समेत दरवाज़े को ऐसी जगह छुपाकर रख दिया कि किसी की नज़र न पड़े। फिर वो लोगों में आकर नाचने और गाने लगा। सेहर होने तक वो नाचता-गाता रहा और फिर महल वापस आ गया। उसने निकाले हुए दरवाज़े को उसकी जगह पर लगा दिया और पहरा देने लगा।
आबू इस बात से बेख़बर था कि रात में चोरों ने महल में दाख़िल होकर तमाम सामान चुरा लिया था।
दूसरे दिन जब बादशाह वापस आया और आबू को दरवाज़े पर पहरा देते देखा तो बेहद ख़ुश हुआ। लेकिन जब वो महल में दाख़िल हुआ तो उसे बड़ी हैरत हुई कि महल में बैठने तक के लिए चटाई न थी।
वो निहायत ग़ुस्से में बाहर निकला और गरजदार आवाज़ में आबू से बोला, “क्या तुम मेरे जाने के बाद बराबर पहरा दे रहे थे?”
“जी हाँ हुज़ूर।”
“फिर महल से चोरी कैसे हुई?” बादशाह ने गरज कर पूछा।
“मुझे कुछ भी नहीं मालूम हुज़ूर।”
“क्या मैंने तुम्हें हुक्म नहीं दिया था कि मेरे वापस आने तक महल का पहरा देते रहना?”
“हुज़ूर, आप ग़लत कह रहे हैं,”* आबू ने निहायत नरमी से कहा।
बादशाह ग़ुस्से से लाल-पीला हो गया।
“हुज़ूर, मेरे कहने का मतलब यह है कि आपने मुझे महल पर पहरा देने के लिए नहीं कहा था।”
“फिर क्या कहा था?”
“हुज़ूर, आपने सिर्फ़ दरवाज़े पर पहरा देने के लिए कहा था और मैं अब तक आप ही के हुक्म पर अमल कर रहा हूँ। हाँ, मैं रात में थोड़ी देर के लिए नाचने और गाने ज़रूर चला गया था।”
“मगर क्या तुम रात में नाचने के लिए गए थे?”
“जी हाँ हुज़ूर, लेकिन मैंने दरवाज़ा निकालकर छुपा दिया था। अगर आपको यक़ीन न आए तो मैं गवाह हाज़िर करता हूँ जिसके सामने…”
“बेवक़ूफ़! अब एक लफ़्ज़ भी अपनी ज़बान से मत निकालना।”
बादशाह ने सिपाहियों को आवाज़ दी। सिपाही दौड़ते हुए चले आए। बादशाह ने उनसे कहा, “इस बेवक़ूफ़ को यहाँ से ले जाओ और गाँव से बाहर एक गड्ढा खोदकर उसमें इसे गर्दन तक दफ़ना दो। फिर मैं सुबह आऊँगा तो फ़ैसला दूँगा।”
सिपाही आबू को पकड़कर ले गए। उन्होंने गाँव से बाहर एक गड्ढा खोदा, आबू को उसमें उतारा और गर्दन तक मिट्टी भर दी। अब आबू का पूरा धड़ मिट्टी में दबा हुआ था। सिर्फ़ उसकी गर्दन ऊपर थी।
वो अपने आस-पास नज़रें दौड़ा रहा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस मुसीबत से कैसे निजात हासिल करे। रात गुज़रती जा रही थी और वो सोचता जा रहा था। यहाँ तक कि सेहर नमूदार होने लगी। मुर्ग़े बाँग देने लगे। सुबह होने को कुछ ही वक़्त बाक़ी रह गया था। उसने सोचा कि अब उसकी जान की ख़ैर नहीं। बादशाह उसे ज़रूर मौत की सज़ा देगा।
अभी वो यह सोच ही रहा था कि अचानक उसे दूर एक ऊँट सवार दिखाई दिया। ऊँट सवार क़रीब आता गया। आबू ने देखा कि एक कुबड़ा ताजिर ऊँट पर माल-ओ-असबाब लिए जा रहा है। आबू का ज़हन तेज़ी से काम करने लगा। उसे उम्मीद की किरण नज़र आई।
ऊँट सवार की नज़र आबू पर पड़ी। आबू को इस हालत में देखकर उसे बड़ा ताज्जुब हुआ। उसने आबू से इसकी वजह दर्याफ़्त की। आबू उस कुबड़े ताजिर के क़रीब आने तक अपने ज़हन में एक तरकीब सोच चुका था।
आबू ने दुखभरे लहजे में कहा, “जनाब, मैं भी आप ही की तरह एक ख़ुशहाल ताजिर हूँ।”
“लेकिन फिर यहाँ इस तरह मिट्टी में क्यों धँसे हो?”
“क्या बताऊँ जनाब, मैं ज़रा कुबड़ा हूँ। यहाँ रहकर इस कुबड़ेपन का इलाज कर रहा हूँ।”
“क्या आप भी कुबड़े हैं?” ताजिर ने हैरत से पूछा।
“कुबड़ा हूँ तभी तो इतनी तकलीफ़ बर्दाश्त कर रहा हूँ।” आबू ने दर्द से कराहते हुए कहा।
“मगर जनाब, यह इलाज आपको किसने बताया है?” ताजिर ने आबू की बात में दिलचस्पी लेते हुए दर्याफ़्त किया।
“जनाब, क्या बताऊँ? अपने कुबड़ेपन को ख़त्म करने के लिए हर तरह का इलाज किया, लेकिन कोई फ़ायदा न हुआ। आख़िर उकताकर शाही हकीम के पास गया। उन्होंने यह इलाज बताया और ख़ुद अपनी निगरानी में यह गड्ढा खुदवाया और मुझे यहाँ इस तरह दबाकर रखा गया कि कुबड़ापन साफ़ हो जाए। शाही हकीम अब थोड़ी देर बाद आने ही वाले हैं।”
“जनाब, वाक़ई कुबड़ेपन को दूर करने का वाहिद इलाज यही है। अब तो मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि मेरा कुबड़ापन बिल्कुल ख़त्म हो चुका है।”
“क्या वाक़ई?”
“हाँ जनाब, मैं सच कह रहा हूँ। शाही हकीम के आने में अब सिर्फ़ दो घंटे रह गए हैं। तब आप ख़ुद ही देख लेना।”
यह सुनकर ताजिर बहुत ख़ुश हुआ। उसने सोचा क्यों न शाही हकीम के आने से पहले मैं ख़ुद भी यह इलाज कर लूँ।
ताजिर ने आबू से कहा, “जनाब, मैं भी कुबड़ेपन का इलाज करते-करते थक गया हूँ। आप मेहरबानी करें तो मुझे भी इस गड्ढे में रहने का मौक़ा दें।”
“जनाब, मुझसे यह न हो सकेगा। शाही हकीम ने हुक्म दिया है कि उनके आने तक गड्ढे से बाहर न निकलूँ।”
ताजिर ने मिन्नत करते हुए कहा, “मैं इसके एवज़ आपको दो ऊँट देने के लिए तैयार हूँ।”
आबू कुछ लम्हे तक सोचता रहा। उसने ताजिर से कहा, “जनाब, आपकी ख़ातिर मैं अपना इलाज अधूरा छोड़ने के लिए तैयार हूँ। मगर शर्त यह है कि दो ऊँटों के साथ कुछ माल-ओ-असबाब भी अता करें।”
ताजिर यह सुनकर बहुत ख़ुश हुआ और अपना सारा माल-ओ-असबाब देने के लिए तैयार हो गया।
ताजिर ने आबू को गड्ढे से बाहर खींचा। बाहर आकर आबू ने अपनी पुश्त को ज़रा इधर-उधर घुमाकर सीधा किया। ताजिर ने जब आबू की पुश्त पर नज़र की तो उसे यक़ीन हो गया कि मेरा कुबड़ापन भी दूर हो जाएगा। उसने ख़ुशी-ख़ुशी आबू को सामान से लदे हुए दो ऊँट दिए। उसके बाद आबू ने उसे गड्ढे में उतारा और उसकी गर्दन तक मिट्टी भर दी।
ताजिर ने एक बार फिर उसका शुक्रिया अदा किया। सुबह होने वाली थी। आबू दो ऊँट लेकर जल्दी से वहाँ से रवाना हो गया।
थोड़ी देर बाद बादशाह के सिपाही वहाँ आ पहुँचे। मगर ये सिपाही वो नहीं थे जो कल आबू को पकड़कर यहाँ लाए थे। उन सिपाहियों ने कुबड़े ताजिर को आबू समझा और उसे गड्ढे से बाहर निकालकर मारते-पीटते बादशाह के दरबार में ले गए।
बादशाह ने ताजिर को देखा तो उसे बड़ी हैरत हुई। उसने ताजिर से दर्याफ़्त किया कि तुम वहाँ कैसे पहुँचे? ताजिर ने रो-रोकर पूरा अहवाल सुनाया।
बादशाह को बहुत ग़ुस्सा आया, मगर वो दिल ही दिल में आबू की होशियारी और अक़्लमंदी की तारीफ़ करने लगा। उसने ताजिर को रिहा कर दिया और सिपाहियों को हुक्म दिया कि आबू को तलाश करके उसके सामने हाज़िर करें।
उसने सिपाहियों से यह भी कहा, “आबू मिल जाए तो उससे कहना कि बादशाह ने तुम्हें माफ़ कर दिया है और तुम्हारी अक़्लमंदी से वो बहुत ख़ुश है।”
जब सिपाही आबू की तलाश के लिए जाने लगे तो बादशाह ने फिर उन्हें रोका और कहा, “आबू से कहना कि तुम्हें एक शर्त पर माफ़ किया जाएगा। जब तू बादशाह से मुलाक़ात करने आए तो तेरे जिस्म पर कपड़े न हों और तू नंगा भी न दिखाई दे, सवारी पर भी बैठा हुआ न हो और पैदल भी न दिखाई दे।”
इस अजीबोग़रीब शर्त को सुनकर सिपाही भी हैरान हो गए। मगर उन्हें इससे क्या मतलब? वो आबू को तलाश करने रवाना हुए। आख़िरकार उन सिपाहियों ने आबू को तलाश कर लिया और जो कुछ बादशाह ने कहा था वो सब उसे कह दिया।
कुछ देर तक आबू सोचता रहा। फिर उसने सिपाहियों से कहा, “बादशाह से कहना कि उसे शर्त मंज़ूर है और वो कल दरबार में हाज़िर होने वाला है।”
सिपाहियों ने बादशाह को आबू का पैग़ाम पहुँचा दिया।
दूसरे दिन दरबारे-आम लगा। तमाम लोग बेचैनी से आबू का इंतज़ार करने लगे। ख़ुद बादशाह भी बेचैन था। कुछ ही देर गुज़री कि लोगों में शोर हुआ, “आबू आ रहा है! आबू आ रहा है!”
बादशाह अपनी जगह से उठा और दरवाज़े पर आकर आबू को देखने लगा।
आबू मछली पकड़ने का जाला जिस्म पर डाले हुए, घोड़े पर बैठे बग़ैर रकाब में एक पाँव डाले, लँगड़ाते हुए चला आ रहा था। वाक़ई उसने बादशाह के हुक्म की लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ तामील की थी।
आबू को इस तरह आते हुए देखकर बादशाह से हँसी ज़ब्त न हो सकी। लेकिन उसका ग़ुस्सा ख़त्म न हुआ था। उसने आबू से कहा, “तुझे सौ मोहरें इनाम दी जाती हैं, मगर तू यह इनाम लेकर यहाँ से चला जा और फिर कभी मुझे अपनी सूरत न दिखाना।”
आबू ने कुछ न कहा, अपना इनाम लिया और चला आया।
इत्तेफ़ाक़ से एक रोज़ बादशाह का बाज़ार से गुज़र हुआ। हर शख़्स बादशाह के सामने आता और झुककर ताज़ीम करता। इस मजमे में सिर्फ़ एक शख़्स ऐसा था जो बादशाह की तरफ़ पुश्त किए खड़ा था। बादशाह ने ग़ौर से उसकी तरफ़ देखा। वो आबू था।
आबू की इस बेअदबी पर उसे बेहद ग़ुस्सा आया। उसने डाँटते हुए कहा, “तुम इतने मग़रूर हो कि मेरी जानिब पुश्त किए खड़े रहे। तुम्हें ज़रा भी शर्म-ओ-हया नहीं आई।”
आबू ने कहा, “हुज़ूर माफ़ करना, आप ही ने हुक्म दिया था कि कभी अपनी सूरत न दिखाना। मैं ग़रीब इसके सिवा क्या करता? मैंने तो आप ही के हुक्म की तामील की है।”
“आबू, तुम लफ़्ज़ों से खेल रहे हो। इस वक़्त तुम लफ़्ज़ी दाँव-पेच में तो कामयाब हो गए हो, मगर आइंदा ऐसा न होगा। आख़िरी बार तुम्हें हुक्म देता हूँ कि इथियोपिया की मिट्टी पर भी क़दम न रखना। अगर तुम इस मुल्क में नज़र आए तो तुम्हें उम्र क़ैद की सज़ा दी जाएगी।” यह कहकर बादशाह वहाँ से चला गया।
एक रोज़ राजधानी में कोई त्योहार था। तमाम लोग ख़ुशियाँ मना रहे थे। पूरा शहर दुल्हन की तरह सजाया गया था। लोग सड़कों पर ख़ुशी से नाच-गा रहे थे। बादशाह भी सजे-सजाए हाथी पर बैठकर लोगों की सलामियाँ लेते हुए शहर का गश्त लगा रहा था।
आबू ने, जो एक मिठाई की दुकान पर बैठा हुआ था, बादशाह को सलाम किया। आबू को यहाँ देखकर बादशाह को सख़्त ग़ुस्सा आया और उसने फ़ौरन आबू को गिरफ़्तार करने का हुक्म दे दिया। लोगों की भीड़ जमा होना शुरू हो गई।
बादशाह आबू से बोला, “क्या मैंने तुझे हुक्म न दिया था कि इस मुल्क में कहीं नज़र मत आना। फिर तुझ में मेरी नाफ़रमानी की हिम्मत कैसे पैदा हुई?”
“हुज़ूर माफ़ करना, मैंने आपके हुक्म की कभी भी नाफ़रमानी नहीं की।”
“आप ही ने हुक्म दिया था कि इथियोपिया की मिट्टी पर क़दम न रखना।”
बादशाह ने कहा, “वही तो मैं कह रहा हूँ। फिर तुझे यहाँ की मिट्टी पर क़दम रखने की हिम्मत कैसे हुई?”
“हुज़ूर, जब आपने हुक्म दिया था तो मैं इथियोपिया छोड़कर मिस्र चला गया था। वहाँ से वापसी के वक़्त मैंने अपने जूतों में मिस्र की मिट्टी भर ली थी और साथ में एक थैली भरकर मिट्टी भी ले आया। वही जूता यहाँ आकर इस्तेमाल करने लगा। रात को सोते वक़्त भी मैं अपना जूता नहीं उतारता हूँ। इस वक़्त भी मैं वही जूता पहने हुए हूँ जिसमें मिस्र की मिट्टी भरी हुई है। इसी मिट्टी पर पाँव रखा हुआ हूँ। आज तक इथियोपिया की मिट्टी पर अपना क़दम नहीं रखा। अब आप ही बताइए कि मैंने आपके हुक्म की तामील की है या नाफ़रमानी।”
आबू का जवाब सुनकर बादशाह बहुत ख़ुश हुआ। दिल ही दिल में उसकी अक़्लमंदी की तारीफ़ करने लगा। उसने आबू के तमाम गुनाह माफ़ कर दिए और उसे फिर से अपने दरबार में मुलाज़िम रख लिया। उसे एक बड़ा ओहदा भी दिया। यह ओहदा ऐसा था जहाँ कोई ज़िम्मेदारी न थी। आबू हँसी-ख़ुशी अपनी ज़िंदगी बसर करने लगा।
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सबक़
- अक़्ल सबसे बड़ी ताक़त है – हर मुश्किल में घबराने के बजाय सोचने वाला शख़्स ही जीतता है। इंसान अगर हालात को समझदारी और सूझ-बूझ से संभाले, तो बड़ी से बड़ी परेशानी का हल निकाल सकता है।
- लफ़्ज़ों की अहमियत पहचानो – जो बात कही जाए उसका सही मतलब समझना बेहद ज़रूरी है। कई बार इंसान जल्दबाज़ी में बात का ग़लत मतलब निकाल लेता है, जिससे परेशानी पैदा हो जाती है।
- होशियारी ईमानदारी की जगह नहीं लेती – आबू की चालाकी ने उसे बचाया, मगर उसकी लापरवाही ने नुक़सान भी पहुँचाया। सिर्फ़ अक़्लमंदी काफ़ी नहीं होती, बल्कि इंसान का ईमानदार और ज़िम्मेदार होना भी उतना ही ज़रूरी है।
- ज़िम्मेदारी पूरी तरह निभाओ – अधूरी ज़िम्मेदारी से बड़े नुक़सान हो सकते हैं। जो काम इंसान को सौंपा जाए, उसे पूरी लगन और ध्यान से पूरा करना चाहिए, ताकि किसी को नुकसान न पहुँचे।
आख़िरी बात
दोस्तों, “हुक्म का गुलाम” एक ऐसी दिलचस्प और सबक़-आमोज़ दास्तान है जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि ज़िंदगी में अक़्ल, सूझ-बूझ और हाज़िरजवाबी कितनी अहमियत रखती है। आबू की यह कहानी आपको कैसी लगी? हमें कमेंट करके ज़रूर बताइए। अगर आपको यह किस्सा पसंद आया हो तो इसे अपने दोस्तों और घरवालों के साथ शेयर कीजिए। ऐसी ही दिलचस्प, मज़ाहिया और सबक़-आमोज़ कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट पर आते रहिए। शुक्रिया!
FAQs
सवाल: आबू कौन था और कहाँ का रहने वाला था?
जवाब: आबू इथियोपिया का एक होशियार और मसख़रा शख़्स था जो अपनी अक़्लमंदी और हाज़िरजवाबी की वजह से मशहूर था।
सवाल: बादशाह ने आबू को सज़ा क्यों दी?
जवाब: महल की चोरी के वक़्त आबू पहरा छोड़कर नाचने चला गया था, इसलिए बादशाह ने उसे गड्ढे में दफ़नाने की सज़ा दी।
सवाल: आबू ने कुबड़े ताजिर के साथ क्या चालाकी की?
जवाब: आबू ने ताजिर को यक़ीन दिलाया कि गड्ढे में दफ़न होने से कुबड़ापन दूर होता है और इस तरकीब से ख़ुद आज़ाद होकर दो ऊँट और सामान हासिल कर लिया।
सवाल: बादशाह ने आबू को आख़िर में माफ़ क्यों किया?
जवाब: आबू ने हर बार बादशाह के हुक्म की लफ़्ज़ी तामील करके यह साबित किया कि वो नाफ़रमान नहीं बल्कि निहायत ज़हीन है। बादशाह उसकी अक़्लमंदी का क़ायल हो गया।
सवाल: इस कहानी से हमें क्या सीखना चाहिए?
जवाब: यह कहानी सिखाती है कि अक़्ल और सूझ-बूझ से बड़ी से बड़ी मुसीबत भी टल सकती है, मगर ज़िम्मेदारी से कभी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।