क़िस्सा: बूढ़े चक्कीबान का | तीन भाइयों के इम्तिहान की दिलचस्प कहानी

तआरुफ़

अस्सलामु अलैकुम प्यारे दोस्तों! आज हम आपके लिए एक ऐसी दिलचस्प उर्दू कहानी लेकर आए हैं, जिसमें अक़्लमंदी, दयानतदारी और ज़िम्मेदारी का ख़ूबसूरत सबक़ छुपा है। क़िस्सा: बूढ़े चक्कीबान का – तीन भाइयों के इम्तिहान की एक दिलचस्प कहानी है, जहाँ एक बूढ़ा बाप अपने बेटों की आज़माइश के लिए उन्हें एक ख़ास सफ़र पर भेजता है। उम्मीद है आपको यह कहानी बहुत पसंद आएगी। तो आइए, शुरू करते हैं क़िस्सा: बूढ़े चक्कीबान का और जानते हैं कि इस इम्तिहान में आख़िर किसने कामयाबी हासिल की।

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क़िस्सा: बूढ़े चक्कीबान का

आज से कई साल पहले किसी मुल्क की दूर-दराज़ बस्ती में एक चक्कीबान रहता था, जिसने इस फ़ानी दुनिया में अपनी ज़िंदगी की कई बहारें देखी थीं और ज़माने की गर्म और सर्द हवाओं के थपेड़े बर्दाश्त किए थे। उस बूढ़े ने अपनी तमाम उम्र हलाल रोज़ी कमाने में बसर की थी, जिसकी वजह से उसे कई मुश्किलात का सामना करना पड़ा था। उसके तीन बेटे थे, जो शमशाद के दरख़्त की टहनियों की तरह बुलंद-क़ामत और सेहतमंद थे।

एक दिन बाप ने अपने बेटों को बुलाया और कहा, “मेरे नूर-ए-चश्म और प्यारो, इस दुनिया में रहने वाले हर शख़्स की ज़िंदगी अच्छी या बुरी गुज़र जाती है। और जिस तरह तुम्हें मालूम है कि मौत एक ऊँट है, जो हर दरवाज़े पर बैठा हुआ है, और तुम्हें मालूम है कि मेरी उम्र का सूरज भी लब-ए-बाम है।”

“आज नहीं तो शायद कल अपने आमाल की गठरी कंधे पर उठाऊँगा और इस फ़ानी दुनिया से कूच करके आलम-ए-बक़ा में पहुँच जाऊँगा। अगर सच पूछो तो मुझे इस सफ़र पर जाने या दुनिया की रंगीनियों को छोड़ने का कोई ग़म नहीं है। लेकिन मेरी ग़मगीनी का सबब यही चक्की है। मालूम नहीं मेरे बाद क्या होगा और चक्की पर क्या गुज़रेगी?”

चक्कीबान के बेटों ने जब बाप की बातें सुनीं, तो तीनों बेटे यक-ज़बान होकर कहने लगे, “अब्बाजान, आप मुतमईन रहें। हम हर मुमकिन कोशिश करेंगे कि चक्की के पहिये घुमाते रहें, ताकि घर के अख़राजात की गाड़ी भी चलती रहे और चक्की के न होने से लोगों को किसी क़िस्म की तकलीफ़ भी न हो।”

चक्कीबान ने मोहब्बत भरी निगाहों से अपने बेटों को देखा और कहा, “अल्लाह तआला से कोई बात छुपी नहीं है और तुम भी जानते हो कि दो सौ बातें आधे अमल जितनी क़ीमत नहीं पातीं। इसलिए कि बात और अमल का दरमियानी फ़ासला ज़मीन और आसमान के दरमियानी फ़ासले के बराबर होता है।”

“क्या मैं तुमसे उम्मीद रखूँ और मुतमईन रहूँ कि तुम वाक़ई मेरी बातों पर अमल करोगे? अगर तुम तीनों भाई मिलकर इस चक्की के पहिये घुमाते रहे, तो बहुत बेहतर होगा। या जिस भाई को मुनासिब समझो, यह चक्की उसी के हवाले कर देना। वर्ना याद रखो कि अगर इस चक्की ने काम न किया, तो तुम ख़ुद भी भूखे मरोगे और दूसरे लोग भी बद-दुआएँ देंगे।”

मेरे दोस्तों, जब बूढ़े चक्कीबान ने अपनी बात ख़त्म की, तो तीनों बेटों में से हर एक ने कहा, “अब्बाजान, मैं ज़्यादा समझदार हूँ, इसलिए चक्की का इंतिज़ाम अच्छी तरह सँभाल लूँगा।”

बूढ़े बाप ने बेटों को ख़ामोश रहने का हुक्म दिया और कहा, “ख़ूब, अक़्ल-ए-सलीम ही इस बात का फ़ैसला करेगी। मैं दलील के बग़ैर किसी बेटे की बात न तो तस्लीम करने के लिए तैयार हूँ और न ही इंकार करता हूँ। इसलिए बेहतर होगा कि तुम्हारा इम्तिहान लिया जाए, ताकि मुझे मालूम हो सके कि तुम में से कौन-सा शख़्स बेहतर है और अहसन तरीक़े से चक्की के पहिये घुमा सकता है। लेकिन ग़ौर से सुन लो और कोशिश करो कि तुम तीनों भाई इम्तिहान में कामयाब हो सको।”

बेटों ने जब इम्तिहान का नाम सुना, तो निहायत शौक़ से ताईद की और कहने लगे, “अब्बाजान, हम हर इम्तिहान के लिए तैयार हैं।”

बूढ़े बाप ने अपने हाथ ज़ानू पर रखे, अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया और दूसरे कमरे में जाकर अख़रोटों की तीन गठरियाँ उठा लाया। फिर बेटों को देखकर कहा, “इन गठरियों में अख़रोट हैं, इसलिए आगे बढ़ो और एक-एक गठरी उठा लो। फिर मैं तुम्हें अगले क़दम के मुताल्लिक बताऊँगा।”

तीनों बेटे आगे बढ़े और एक-एक गठरी उठा ली, क्योंकि ये गठरियाँ ज़्यादा वज़नी न थीं और बाप तो तीनों गठरियाँ एक साथ उठा लाया था। फिर उसने तबेले की तरफ़ इशारा किया और कहा, “शहर जाने के लिए अपनी सवारी के गधे तैयार कर लो और ज़ाद-ए-राह के लिए कुछ ख़ुराक और दीगर अख़राजात के लिए रक़म भी ले लो।”

तीनों बेटों ने ख़ुशी-ख़ुशी अपने बाप के हुक्म की तामील की और सफ़र की तैयारी करते हुए ज़ाद-ए-राह साथ ले लिया और गधों पर सवार होकर चक्की के सामने खड़े हो गए। बाप भी लाठी के सहारे चलता हुआ आया और बेटों के पास खड़ा हो गया और कहने लगा, “मेरे बेटों, तुम्हारा इम्तिहान अब शुरू होता है। तुम अभी शहर की तरफ़ जाओ। मुझे अल्लाह तआला की ज़ात पर पूरा भरोसा है कि तुम ख़ैरियत से जाओगे और बा-आफ़ियत लौटोगे।”

“शहर में मेरे तीन पुराने दोस्त हैं, इसलिए तुम में से हर एक शख़्स मेरे एक-एक दोस्त के पास पहुँच जाना। फिर उन्हें मेरा सलाम कहना और पूछना कि दुनिया में रिज़्क़-ए-हलाल कैसे हासिल किया जा सकता है? लेकिन याद रखो, इस सफ़र में तीन दिन से ज़्यादा ख़र्च न करना। वैसे इस बात का क़वी इमकान है कि अगर तुमने देर कर दी, तो बाप की जगह को ख़ाली पाओगे।”

बड़े बेटे ने पूछा, “अब्बाजान, फिर हमारे इम्तिहान का नतीजा क्या होगा?”

बाप ने बड़े बेटे के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “हमारी पूरी ज़िंदगी एक इम्तिहान है। यह दुरुस्त है कि तुम्हारा यह सफ़र दूसरे सफ़र की तरह एक छोटा-सा इम्तिहान है। लेकिन इन चंद दिनों में मालूम हो जाएगा कि अल्लाह तआला ने किस शख़्स को कौन-से मक़सद के लिए पैदा किया है। अब जल्दी करो और अपने भाइयों के हमराह रवाना हो जाओ। तुम्हारा काम ज़्यादा और वक़्त कम है।”

दोस्तों, बेटों ने जब बाप की बातें सुनीं, तो अपने-अपने गधों पर सवार हो गए और अपना दिल सफ़र के लिए सुपुर्द कर दिया। अब वो शहर की तरफ़ जा रहे थे, लेकिन उनके दिलो-दिमाग़ में तरह-तरह के ख़यालात की आमद-ओ-रफ़्त थी। यानी हर भाई सोच रहा था कि वो इम्तिहान में पूरा उतरेगा और जब अपने बाप के पास पहुँचेगा, तो चक्की का मालिक बनकर उसके पहिये घुमाएगा।

वो इन्हीं ख़यालात में खोए हुए चल रहे थे कि अचानक मुड़कर देखा, तो मालूम हुआ कि अपने गाँव से काफ़ी दूर आ गए हैं और चक्की भी उनकी नज़र से ओझल हो गई है। और जो चीज़ उनके सामने थी, वो शहर का लंबा सफ़र था, जिसके लिए उन्हें चलना है, चलना है और चलना है।

क़िस्सा मुख़्तसर, उन्होंने कुछ देर मज़ीद सफ़र किया, लेकिन आख़िरकार बहुत जल्द थक गए। अचानक उन्हें दूर से एक सायादार और आराम की जगह दिखाई दी, इसलिए मँझले भाई ने दूसरे भाइयों की तरफ़ देखते हुए कहा, “अब आराम का वक़्त है, कुछ खा-पी लें। अगर हम इसी तरह चलते रहे, तो हमारे बदन की बाक़ी माँदा ताक़त भी जवाब दे जाएगी।”

दूसरे भाइयों ने भी उसकी तजवीज़ मान ली और अपने गधों की ख़ुर्जीन से खाने-पीने का सामान निकालने लगे। इतने में अचानक बड़ा भाई चिल्लाया और फ़रियाद करते हुए कहने लगा, “हाए अफ़सोस! तुमने देखा है कि क्या हुआ?” उसके दोनों भाई आगे बढ़े और पूछने लगे, “क्या माजरा है? कौन-सी आफ़त टूट पड़ी है?”

बड़े भाई ने अपने मश्कीज़े की तरफ इशारा किया और कहा, “रास्ते में इसका मुंह खुल गया है और क़तरा-क़तरा तमाम पानी बह गया है। अब मैं परेशान हूं कि क्या करूं?”

छोटे भाई ने कहा, “तुमने बड़ी लापरवाही से काम लिया है। अब हमारे पास सिवाय इस मश्कीज़े के दूसरा कोई बर्तन नहीं है। अब हमें अपनी प्यास बुझाने के लिए बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा।”

बड़ा भाई कहने लगा, “बड़ा अजीब सफ़र है, लेकिन सफ़र में तो ऐसे हादसात होते ही हैं। इसलिए आओ और बैठकर सोचते हैं।”

छोटे भाई ने मश्कीज़ा उठाया और कहा, “पहला और ज़रूरी काम यह है कि पानी तलाश करें।”

बड़े भाई ने कहा, “आग जलाने के लिए लकड़ी जमा करनी है, लेकिन पानी की तलाश में कौन जाएगा? लकड़ियाँ कौन जमा करेगा और कौन खाना पकाएगा?”

तीनों भाई ख़ामोश थे और एक-दूसरे को देख रहे थे। बड़े भाई ने उन्हें देखा, तो कहा, “मुश्किल और अहम काम लकड़ियाँ जमा करना है। यह काम मैं ख़ुद ही अंजाम दूँगा। अगर लकड़ी न हुई, तो हम खाना कैसे पका सकते हैं?”

बड़े भाई ने अपनी बात के जवाब का इंतिज़ार न किया और अपनी जगह से उठकर लकड़ियाँ लाने के लिए चल पड़ा। लेकिन मँझले भाई ने मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा, “वाक़ई अहम काम लकड़ी का इंतिज़ाम है। गोया पहाड़ खोदना होगा, ताकि उससे लकड़ी निकाली जाए। नहीं, मेरे भाई, मुश्किल काम खाना पकाना है। अगर लकड़ी और पानी मौजूद हों और पकाने वाला कोई न हो, तो हम भूख से मर जाएँगे।” मँझले भाई ने इतना ही कहा था कि अपनी जगह से उठा और खाना पकाने के लिए चूल्हा बनाने में मशग़ूल हो गया।

अब छोटा भाई रह गया था और उसके सामने खाली मश्कीज़ा पड़ा था, लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि पानी कहां से लाए। बहरहाल, उसने हिम्मत ना हारी और मश्कीज़ा उठाकर पानी की तलाश में चल पड़ा और अपने दिल में कहने लगा, “मेरे भाइयों ने अपना-अपना काम संभाल लिया है, इसलिए बेहतर होगा कि मैं भी पानी लाने में कामयाब हो जाऊं। खाना पकाने और प्यास बुझाने के लिए हमें पानी की अशद ज़रूरत है।”

छोटे भाई ने अपनी रफ्तार बढ़ा दी और पहाड़ी की तरफ चल पड़ा, जो वहां से क़रीब ही थी। दोस्तों, बेहतर होगा कि हम सिर्फ छोटे भाई का तआक़ुब करें और देखें कि वो कहां जाता है और पानी कैसे हासिल करता है। उसके दूसरे भाई अपने-अपने काम में मशगूल हो गए थे और छोटे भाई को यकीन था कि वो बहुत जल्द अपने-अपने काम से फारिग हो जाएंगे।

अलग़रज़, छोटे भाई ने मश्कीज़ा अपने कंधे से लटकाया और पहाड़ी की तरफ चल पड़ा ताकि उसे पानी मिल जाए। वो जानता था कि अक्सर पहाड़ों में चश्मे होते हैं और शायद वो भी किसी चश्मे पर पहुंच जाए। वो चलता रहा और चलता रहा। उसने पहाड़ी सिलसिले के चंद टीले उबूर किए, लेकिन जितना ही आगे गया, उसे पानी का वजूद कहीं भी नजर ना आया।

वो परेशान था कि कहीं ऐसा ना हो कि उसे पानी ना मिले और उसके भाई प्यास से जान दे दें और हमारा सफर यहीं ख़त्म हो जाए। फिर हम ना तो शहर जा सकेंगे और ना ही अपने बाप के पहलू में बैठना नसीब होगा। फिर वो कुछ देर के लिए एक चट्टान के साये में बैठ गया और सोचता रहा और थोड़ी देर आराम भी कर लिया।

फिर उसने इरादा किया कि अपनी आंखें और कान अच्छी तरह खोले और पानी के चलने और सुर-सुर की आवाज़ पर ध्यान दे और चारों तरफ देखे। मुमकिन है उसे पानी नज़र आ जाए या उसके चलने की आवाज़ सुनाई दे। इधर-उधर फिरने से उसके हाथ कुछ नहीं आएगा।

छोटे भाई के ज़हन में जब यह नई तदबीर आई तो अपनी जगह से उठा और दोबारा पानी की तलाश में पहाड़ी सिलसिलों में फिरने लगा। वो इसी तरह चल रहा था कि उसे दूर से पानी के क़तरों के टपकने की आवाज़ सुनाई दी। फिर उसने अपने कान खड़े किए और उसी आवाज़ के तआक़ुब में चल पड़ा।

अभी वो ज़्यादा दूर ना गया होगा कि पानी के चश्मे पर पहुंच गया। वो बहुत खुश था लेकिन उसके नज़दीक़ गया तो अपनी जगह पर हैरान और परेशान खड़ा हो गया। चश्मे का पानी कम था, लेकिन फिर भी उसे यक़ीन था कि मश्कीज़ा भर लेगा। उसे अपनी ज़ात से ज़्यादा अपने भाइयों की फिक्र थी।

बहरहाल, वो निहायत एहतियात से आगे बढ़ा और बड़ी मुश्किल से मश्कीज़ा भरा और निहायत सब्र और हौसले से चारों तरफ देखकर मश्कीज़ा उठाया और वापस चल पड़ा। अभी वो चंद क़दम ही चला होगा कि एक पत्थर को फलांगते हुए फिसला और चारों शाने चित गिर पड़ा, जिससे उसके हाथ और बाज़ू ज़ख़्मी हो गए। फिर वह बड़ी मुश्किल से संभला और सबसे पहले मश्कीज़े को देखा, जो सही सलामत था। इसलिए खुश हुआ और अपने ज़ख़्मों को भी ना सहलाया और आगे चल दिया, ताकि जल्द से जल्द अपने भाइयों के पास पहुंचे।

छोटा भाई यह देखकर हैरान हो गया कि वो दोनों सोए हुए हैं, गोया सात बादशाहों को ख़्वाब में देख रहे हैं। मँझले भाई की नींद बड़े भाई से ज़्यादा गहरी थी। उसने अखरोटों की थैली खोली थी, इसलिए छिलके इधर-उधर बिखरे पड़े थे। छोटे भाई ने उन्हें बेदार किया तो वो मश्कीज़े को देखते ही उस पर पिल पड़े और गटागट पानी पीने लगे।

जब सैर हुए तो ऐतराज़ करने लगे कि “तुम्हें मालूम है कि तुम कहां रहे हो? जब हम प्यास और थकावट से मजबूर हो गए तो सो गए। अगरचे तुमने मश्कीज़ा उठा लिया था, लेकिन असल में सैरो-सियाहत करते रहे हो।”

दूसरे भाई ने कहा, “अफसोस! पानी के लिए मैं ख़ुद जाता तो साफ और पाकीज़ा पानी लाता और इतनी देर भी ना लगाता, जबकि हालत यह है कि हमारा काफी वक़्त ज़ाया हो गया है।”

दोनों भाइयों के जी में जो कुछ आया, अपनी-अपनी कहते रहे और छोटा भाई ख़ामोशी से सुनता रहा। उसके बाद उन्होंने खाना पकाया और खाने के बाद अपना सामान समेटा और शहर की तरफ रवाना हो गए।

हां मेरे दोस्तों, बूढ़े चक्कीबान के बेटे कई हादसात से गुजरे, जिनका बयान करने का हौसला न तो क़िस्सा गो के लिए मुमकिन है और न ही शायद तुम्हारे पास इतना वक़्त हो कि तसल्ली से बैठे रहो और बेफिक्री से सुनते रहो।

बहरहाल, तीनों भाई थके-माँदे और भूखे-प्यासे शहर पहुंच गए। छोटे भाई ने जूँ ही शहर में क़दम रखा तो कहने लगा, “मैं तो सबसे पहले अपने वालिद के दोस्त के पास जाऊंगा और उन्हें वालिद का पैग़ाम पहुंचाऊंगा।”

मँझले भाई ने कहा, “अभी किसी जगह जाने की ज़रूरत नहीं है। सालन तो नहीं है कि ठंडा हो जाएगा। हम कल और परसों तक इसी शहर में हैं। अभी तो थकावट से हमारा बदन चूर है। इसलिए मैं तो आज पूरा दिन आराम करूंगा।”

बड़ा भाई कहने लगा, “अगर मैं थका हुआ न होता तो ज़रूर जाता, लेकिन इस वक़्त तो मुझे आराम करना है और उसके बाद बाज़ार जाकर कुछ खरीदूंगा। आखिर कई सालों से मेरी ख़्वाहिश थी कि एक जोड़ा गरम मोज़े खरीदूं। अगर मैं अब मोज़े न खरीद सका तो शायद मुझे फिर कभी मौका न मिलेगा। अगर मैं कल अपने बाप के दोस्त के पास न जा सका तो परसों जरूर उनकी ख़िदमत में पहुंच जाऊंगा।”

हां मेरे दोस्तों, यह सूरते हाल देखकर सिर्फ छोटा भाई ही रह गया था कि अपने भाइयों से पहले रवाना हो और बाप का पैग़ाम उसके दोस्त को पहुंचाए और उससे हलाल रोज़ी कमाने के ज़राए दरियाफ़्त करे। अब हम उसके दूसरे भाइयों को देखते हैं कि वो कहां हैं और क्या कर रहे हैं।

मंझला भाई दूसरे दिन सुबह अपने बाप के दोस्त के पास उसके घर के दरवाज़े पर पहुंचा और दरवाज़ा खटखटाया तो उसकी बीवी ने दरवाज़ा खोला और कहा, “मेरे ख़ाविंद की तबीयत नासाज़ थी, इसलिए हकीम से नुस्ख़ा लाया था। अब वो अत्तार की दुकान से दवा लाने के लिए गया हुआ है। अगर वो ज़ुहर तक लौट आया तो तुम्हारी मुलाक़ात ज़रूर हो जाएगी।”

मंझला भाई निहायत बेसब्र और जल्दबाज़ था, इसलिए कहने लगा, “इस शहर में मेरे और भी कई काम हैं, आज नहीं तो यक़ीनन कल तक ज़रूर मुलाक़ात हो जाएगी। इसलिए मैं जाता हूं और कल तुलू-ए-आफताब के वक़्त दोबारा आ जाऊंगा।” उसने यही कहा और अपने भाइयों के पास सराय में आ गया।

अब हम तीसरे भाई की तलाश में जाते हैं कि वो कहां है और क्या कर रहा है। हां, जैसे बड़े भाई ने कहा था कि मैं मोज़े ख़रीदने का इरादा रखता हूं ताकि मेरी कई सालों की ख़्वाहिश पूरी हो। इसलिए वो बाज़ार चला गया और जब मोल-तोल पूछा तो उसे महसूस हुआ कि उसके पास रक़म बहुत कम है। इसलिए अपने भाइयों को तलाश करने लगा और अपनी मजबूरी उनसे बयान की। लेकिन उसके भाई भी उसी की तरह खाली हाथ थे। इसलिए उन्होंने अपने सर झुका लिए और कुछ न कहा।

बड़ा भाई जब अपने भाइयों से ना-उम्मीद हो गया तो सोचने लगा कि अब तो मुझे अख़रोटों की थैली फ़रोख़्त करनी पड़ेगी ताकि मोज़े ख़रीद सकूं। फिर वो दोबारा बाज़ार गया और अख़रोटों की थैली फ़रोख़्त करके अपने पसंदीदा मोज़े ख़रीद लिए।

अब हम दोबारा मँझले भाई की तरफ लौटते हैं जिसका काम अभी तक नामुमकिन था। इसलिए तुलू-ए-आफताब के वक़्त मंझला भाई अपने बाप के दोस्त के घर पहुंचा और दरवाज़ा खटखटाया। काफी इंतज़ार के बाद भी उसे कोई जवाब ना मिला, इसलिए समझ गया कि साहिब-ए-ख़ाना किसी काम के लिए घर से बाहर गया हुआ है। इस तरह मँझले भाई के सफर का तीसरा दिन भी ख़त्म हो गया।

अब तीनों भाई सराय में बैठे थे ताकि अगले दिन वापसी का सफर करें। इसलिए हर तरह की बातें करते रहे और उस शहर में जो कुछ देखा और सुना था एक-दूसरे को बताने लगे। इतने में छोटे भाई ने कहा, “अब हमारे लिए कौन सा काम बाक़ी रह गया है?”

मँझले भाई ने कहा, “मेरे ज़िम्मे जो काम था, मैंने पूरा कर लिया है। सिर्फ अपने बाप का पैग़ाम नहीं पहुंचा सका हूं। इसलिए कि बाप का दोस्त सफर पर गया हुआ है, इसलिए मेरा और कोई काम बाक़ी नहीं है।”

बड़े भाई ने कहा, “अगर मुझसे पूछो तो मेरा भी कोई काम बाक़ी नहीं है जिसे पूरा करूं। मैं तो यहां सिर्फ मोज़े ख़रीदने आया था, जो मैंने ख़रीद लिए हैं और अख़रोटों की थैली भी फ़रोख़्त कर दी है। सिर्फ पैग़ाम पहुंचाना है और मैं यह काम कल अंजाम दे दूंगा।”

छोटे भाई ने कहा, “हमें कल सुबह रवाना हो जाना चाहिए। तुम्हें याद होगा कि बाप ने कहा था कि अगर तुम देर से लौटोगे तो शायद मुझे न देख सकोगे।”

बड़ा भाई तो ऐसी बातें सुनने का मुन्तज़िर था, इसलिए खुश हुआ और कहा, “अच्छा हुआ कि तुमने याद दिलाया। इसलिए अगर बाप ने पूछा तो कह दूंगा कि मेरा पहला और ज़रूरी काम पैग़ाम पहुंचाना था, लेकिन देर हो गई थी और तुम्हारा दोस्त सफर पर चला गया था। इसलिए मैंने मुनासिब समझा कि जल्द वापस आऊं और घर पहुंचूं।”

क़िस्सा मुख़्तसर, उस रात तीनों भाई काफी देर तक बातें करते रहे और फिर सो गए। दूसरे दिन सुबह जब उठे तो अपना सामान बांधा और घर की तरफ रवाना हो गए। रास्ते में बड़े भाई से ज़्यादा कोई भी खुश न था। वो अपनी हर बात के साथ-साथ कहता कि यक़ीनन बाप मेरी अक़्ल-ओ-समझ की दाद देगा और मेरे मुक़ाबले में तुमने जो काम किया है वो बे-फायदा और बे-नतीजा है।

“इसलिए कि हमारे छोटे भाई ने तो अख़रोटों को छुआ तक नहीं है। अलबत्ता मँझले भाई ने अपनी थैली से चंद अख़रोट खाए हैं और अपना जी बहलाया है। लेकिन मैंने तो उनसे पूरा फायदा उठाया है और उन्हें फ़रोख़्त करके मोज़े ख़रीद लिए हैं। हालांकि अक़्लमंदी यही थी कि तुम भी ऐसा ही करते और कामयाबी से लौटते।”

मँझले भाई ने जब यह सुना तो हैरत और ताज्जुब से मुंह में उंगलियां दे दीं और कहा, “हाय अफसोस! मेरे दिल में यह ख़याल क्यों ना आया और मैंने भी ऐसा क्यों ना किया। यक़ीनन, बाप तुम्हारी अक़्लमंदी की बदौलत तुम्हें चक्की का मालिक बना देगा और हमें वहां भी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।”

हां मेरे दोस्तों, तीनों भाई इन्हीं बातों में सरगर्म थे और आखिरकार अपने गांव और घर पहुंच गए। जब बाप की ख़िदमत में हाज़िर हुए तो बाप ने कहा, “मेरे बेटों, अब जाओ और नहा-धोकर साफ कपड़े पहन लो और कुछ देर आराम करने के बाद मेरे पास आ जाना।”

तीनों भाई चले गए और नहा-धोकर साफ और उजले कपड़े पहनकर खाना खाया और ताजा दम हो गए। तब बाप की ख़िदमत में हाज़िर हुए ताकि सफ़र के वाक़ियात और हालात बताएँ। बूढ़े बाप ने बेटों की तरफ़ देखा और कहा, “अब बारी-बारी अपना वाक़िआ बयान करो, जो इस सफ़र में तुम्हें पेश आया है।” हर एक बेटे ने प्याज़ से लेकर लहसुन तक अपनी-अपनी सरगुज़श्त बयान की।

बूढ़े बाप ने हर बेटे की बातें निहायत ग़ौर से सुनीं और कुछ देर सोचने के बाद छोटे बेटे की तरफ़ इशारा किया और कहा, “मेरे बाद तुम्हारा छोटा भाई इस क़ाबिल है कि चक्की के पहिये घुमाता रहे।” मँझले भाई ने बाप के फ़ैसले पर एतराज़ किया, लेकिन बूढ़े बाप ने गहरा साँस लिया और कहा, “मेरे फ़ैसले की पहली वजह यह है कि जब तुम रास्ते में भूख और प्यास से निढाल थे, तो सबसे मुश्किल काम की अंजामदेही के लिए तुम्हारा छोटा भाई ही कमर-बस्ता हुआ और पानी की तलाश में निकला था और ज़ख़्मी होने के बावजूद मश्कीज़ा भर लाया।”

“दूसरी वजह यह है कि मैंने जो अमानत उसे दी थी, उसने उसकी अच्छी तरह हिफ़ाज़त की। मैंने यह तो नहीं कहा था कि अख़रोट खा लेना या उन्हें बेच देना। और तीसरी और अहम वजह यह है कि उसने अपना फ़र्ज़ अहसन तरीक़े से निभाया है और इस पर अमल करते हुए शहर में दाख़िल होते ही, यानी पहली फ़ुर्सत में, मेरा पैग़ाम मेरे दोस्त को पहुँचाया और उससे हलाल रोज़ी हासिल करने के तरीक़े दरियाफ़्त किए। बस यही वजह है कि मैं तुम्हारे छोटे भाई को अपनी ग़ैर-मनक़ूला जायदाद, यानी इस चक्की का मालिक बना रहा हूँ।”

“यह इस क़ाबिल है कि सख़्त और मुश्किल काम अंजाम दे सकता है। यह इस चक्की के पहिये अच्छी तरह घुमाएगा। लोगों की अमानतें, यानी गेहूँ और आटे की हिफ़ाज़त करेगा और उनमें ख़ियानत नहीं करेगा। इस बात का भी ख़याल रखेगा कि अपने गाहकों से जो वादा करेगा, उसे अच्छी तरह निभाएगा। इसलिए कोई शख़्स इस पर बद-अहदी या बद-दयानती का इल्ज़ाम आयद नहीं कर सकेगा। इसलिए आज के बाद यह इस चक्की का मालिक है।”

बाप ने गहरा साँस लिया और दूसरे बेटों को देखते हुए कहने लगा, “अगर अब तुम कुछ कहना चाहते हो तो बेख़तर कह सकते हो। क्या इस चक्की का हक़ तुम्हारे छोटे भाई का ही है या नहीं?”

मेरे दोस्तों, बड़े और मँझले भाई को कुछ कहने की हिम्मत न हुई, इसलिए बदस्तूर ख़ामोश खड़े रहे और अपने छोटे भाई की कारकर्दगी पर तहसीन करने लगे। उसके बाद छोटा भाई कई साल चक्की के पहिये घुमाता रहा और उम्र भर लोगों का हक़ ग़सब करने से पहलू-तही करता रहा।

हाँ मेरे दोस्तों, वो कई साल इस फ़ानी दुनिया में रहा और उसके क़ुर्ब-ओ-जवार में रहने वाले लोग उसकी दयानतदारी के मोतरिफ़ रहे। और मेरी दुआ है कि जब तक यह ज़िंदगी है, तुम भी ख़ुश रहो और सलामत रहो।

सबक़:

  • अमल की अहमियत: सिर्फ बातें करने से कुछ हासिल नहीं होता, असल कामयाबी मेहनत, अमल और ज़िम्मेदारी निभाने में है।
  • अमानतदारी की अहमियत: इंसान को सौंपी गई हर अमानत की हिफाज़त ज़िम्मेदारी और ईमानदारी से करनी चाहिए, क्योंकि यही असली दयानतदारी है।
  • फर्ज़ को पहले तरजीह देना: अपने आराम और ख़्वाहिशों से पहले फर्ज़ और ज़िम्मेदारियों को अहमियत देना इंसान को कामयाब बनाता है।
  • सब्र और इस्तिक़ामत: मुश्किल वक़्त में हिम्मत न हारना और चोट खाने के बावजूद अपने मक़सद को पूरा करना इंसान को बुलंद मुक़ाम दिलाता है।

❓अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

सवाल 1: बूढ़े चक्कीबान ने छोटे बेटे को ही चक्की का मालिक क्यों बनाया?
जवाब:
क्योंकि छोटे बेटे ने ज़िम्मेदारी , ईमानदारी और दयानतदारी का सबूत दिया। उसने मुश्किल हालात में भी अपना फर्ज़ अच्छी तरह निभाया।

सवाल 2: इस कहानी से हमें क्या सबक़ मिलता है?
जवाब:
यह कहानी हमें सिखाती है कि सिर्फ बातें नहीं, बल्कि अच्छे अमल, मेहनत और ज़िम्मेदारी से इंसान कामयाब होता है।

सवाल 3: तीन भाइयों के इम्तिहान का मसद क्या था?
जवाब:
बूढ़ा चक्कीबान यह जानना चाहता था कि उसके बाद चक्की की ज़िम्मेदारी कौन बेहतर तरीक़े से सँभाल सकता है।

सवाल 4: बड़े और मँझले भाई से क्या ग़लती हुई?
जवाब:
उन्होंने आराम और अपनी ख़्वाहिशों को ज़्यादा अहमियत दी, जबकि छोटे भाई ने ज़िम्मेदारी को सबसे पहले रखा।

सवाल 5: क्या यह कहानी बच्चों और बड़ों दोनों के लिए मुफ़ीद है?
जवाब:
जी हाँ, यह कहानी बच्चों और बड़ों दोनों को ईमानदारी, मेहनत और ज़िम्मेदारी का अहम सबक़ देती है।

सवाल 6: “क़िस्सा बूढ़े चक्कीबान का” किस तरह की कहानी है?
जवाब:
यह एक दिलचस्प अख़लाक़ी और सबक़ देने वाली उर्दू-हिंदी कहानी है, जिसमें ज़िंदगी के अहम सबक़ छुपे हुए हैं।

आखिरी बात:

प्यारे दोस्तों, बूढ़े चक्कीबान का यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि ईमानदारी और ज़िम्मेदारी का रास्ता ही असल में कामयाबी का रास्ता है। अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें। आपको इस कहानी का कौन सा हिस्सा सबसे अच्छा लगा? हमें कमेंट करके बताएं और ऐसे ही मज़ीद दिलचस्प क़िस्से-कहानियों के लिए हमारे ब्लॉग को फॉलो करना न भूलें।

अगर आपको दिलचस्प और सबक़-आमोज़ कहानियाँ पसंद हैं, तो हमारी दूसरी मशहूर कहानी “क़िस्सा अनोखी शर्त” भी ज़रूर पढ़ें। शुक्रिया!

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